किसान उत्पादक कंपनी

फार्मर्स प्रोडूसर कंपनी

  • यह कम्पनी प्राथमिक उत्पादको दयारा बनाई जाती. इस कंपनी को फसल, सब्जी, फल, दूध, मछली, मुर्गी आदि उत्पादन करने वाले किसान आसानी से बना सकते है.
  • यह एक वैधानिक संस्था है जिसमे इसके सदस्यों को ही इससे लाभ या बचत का फायदा मिलता है. इस लाभ को वो लोग आपस  में बाट सकते है और अपने लिए एक नया व ज्यादा लाभ या कमाई का स्रोत पैदा कर सकते है.
  • बीज उत्पादक कंपनी के फायदे- जब अकेला किसान अपनी कम फसल को बेचता है तो उसको लाभ कम मिलता है. अगर किसान कम्पनी बनाकर कही बाहर या ऊंचे भाव वाली मंडी में बेचते है, तो उनको लाभ ज्यादा होता है. सभी किसान फसल उत्पादन करते है यदि ये लोग कंपनी के दयारा बीज उत्पादन या फल सब्जी, दूध आदि की प्रोसेसिंग करते है, तो उनको लाभ ज्यादा मिलता है. किसान कम्पनी के माध्यम से बीज, खाद, दवाई आदि का लाइसेंस लेकर, इकठठा खरीदकर आपस में सदस्य या गाँव के किसानो को बेंचते है तो उनको कीमत कम लगती. अगर कोई नये यंत्र या यंत्रो को खरीदकर किराये पर देने से किसानों की उपज बढेंगी. नयी फसल या तरीका को अपनाने व बाद में उपज को बेंचने में भी किसान को सुविधा रहती है.
  • किसान उत्पादक कंपनी कैसे बनाए
  • कंपनी बनाने के लिए कुछ किसान जो थोड़े पढ़े लिखे हो वो लोग अपने गाँव या समीप के गाँव के लोगो का समूह बनाये. इन लोगो के साथ  दो या तीनबार  बैठक करे व उनसे कंपनी बनाने व उसके फायदों के बारे में चर्चा करे. कंपनी बनाने के लिए 33 % से अधिक सीमांत ( जिनके पास एक हेक्टर से कम जमीन है) व लघु (जिनके पास 1-2 हेक्टर जमीन हो) किसान कंपनी के सदस्य होने चाहिए ताकि कंपनी को सरकार से मिलने वाली छूट का लाभ भी मिल जाये. इसमें ध्यान ये रखे की किसान समान सोच व रूचि वाले होने चाहिए तथा उनके अन्दर अपनी खेती से ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की इच्छा/चाहत हो, ताकि कंपनी को आसानी से चलाया जा सके.
  • अब उस गाँव के ग्रुप में से ही एक आदमी का चुनाव करे जो किसानों की सामान्य जानकारी इकठठा कर सके व बाद में कोई सूचना या जानकारी आये तो लोगो तक उसको पहुंचा सके.
  • बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर का चुनाव – बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर का चुनाव कंपनी में शामिल होने वाले लोगो में से ही सर्वसम्मति से करते है, यह थोड़े पढ़े लिखे व कम्पनी को चलाने में सक्षम हो. बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर की संख्या 5 से लेकर 15 तक हो सकती है. इस बोर्ड में एक या दो महिला भी होनी चाहिए.
  • अध्यक्ष व सचिव का चुनाव- चुने गए बोर्ड डायरेक्टर में से अध्यक्ष व सचिव का चुनाव करते है. ये लोग हस्थाक्षरी ऑथोरिटी होते है व बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर के साथ मिल कर कम्पनी चलते है.
  • कंपनी के सदस्य- कोई भी प्राथमिक उत्पादक कंपनी का मेम्बर हो सकता है. एक घर से केवल एक ही आदमी कंपनी का  सदस्य हो सकता है. कंपनी में जितने ज्यादा सदस्य होंगे उतना अच्छा है. शुरूआत में 250-500 मेम्बर से कंपनी शुरू कर सकते है. बाद में सदस्य संख्या बढ़ाते रहे. एक कंपनी में कम से कम 10 सदस्य हो सकते है तथा अधिकतम सदस्यों की कोई सीमा नहीं है.
  • कंपनी का पंजीयन- अपनी जान पहचान या अपने जिले में किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट (सी.ए.) तलाशे. यह सी.ए. कंपनी का पंजीयन करवा देंगे.
  • कागजात- सी.ए. को प्राथमिक उत्पादक/ किसानों की सूची जो कंपनी में सदस्य बनना चाहते है, बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर व अध्यक्ष, सचिव का  नाम, पेन कार्ड, आधार नंबर, पता आदि के कागजात उपलब्ध कराये ताकि वह कंपनी का पंजीयन करा सके.
  • पंजीयन फीस – कंपनी के पंजीयन में लगभग 40000 (चालीस हजार रुपये) रुपये का खर्चा आता है, इसमें पंजीयन की फीस, सी.ए. की  फीस व स्टाम्प आदि के खर्चे आते  है.
  • कंपनी बनाते समय कंपनी के पास 100000 (एक लाख रुपये) रुपये होने चाहिए जिसे पेड अप कैपिटल कहते है.
  • यह पैसा सदस्य किसानों से एकत्रित किया जाता है. एवं कंपनी को चलाने, व्यापार करने व अन्य खर्चो के लिए भी पैसा सदस्य किसानों से एकत्रित करते है तथा उनको कंपनी में शेयर होल्डर बनाया जाता है. बाद में जो भी कंपनी में लाभ होता है, उतना शेयर के अनुपात में लाभ का वितरण किया जाता है.
  • दो या तीन महीने के अन्दर कंपनी का पंजीयन हो जाता है. अब कंपनी के सदस्य व्यापार शुरू कर सकते है.
  • बिज़नेस प्लान- अब कंपनी सदस्य मिलकर व्यापार की रूपरेखा बनाये की इसके अन्दर किसका व कितनी मात्रा में व्यापार करना है.
  • कंपनी का व्यवसाय- कंपनी बनाने के बाद निम्नलिखित प्रकार के व्यापार कर सकते है.
  • बीज प्रमाणीकरण – बीज उत्पादन, प्रोसेसिंग, पैकिंग,मार्केटिंग आदि.
  • खाद, बीज, दवाई का लाइसेंस लेकर किसानों को बेंचना.
  • कृषि उत्पाद को खरीदकर किसी ज्यादा भाव वाले बाजार में बेचना.
  • कृषि उत्पाद का ब्रांड बनाना, पैकेजिंग, मानकीकरण, लेबलिंग एवं मार्केटिंग.
  • कृषि उत्पाद की प्रोसेसिंग करके नया उत्पाद बनाना व बेंचना.
  • डेयरी, दुग्ध उत्पादन, मधुमक्खी पालन, रेशम पालन, मुर्गीपालन या अन्य व्यवसाय.
  • किसानों के उत्पादन व उपलब्धता के आधार पर अन्य कोई व्यवसाय.
  • कृषि उत्पादो का निर्यात.
कंपनी को आर्थिक सहयोग
  • कंपनी के सदस्यों से पैसा एकत्रित करे.
  • प्रबन्धन पूँजी- शुरूआती समय में कंपनी के लिए फर्नीचर, लेखन सामग्री आदि के लिए स्माल फार्मर्स एग्रीकल्चर कंसोर्टियम (एस.एफ.ए.सी., Small Farmer Agriculture Consortium., SFAC) लगभग 3.5 लाख रुपये देता है.
  • इक्विटी ग्रांट फण्ड- जितना कंपनी के सदस्य पैसा एकत्रित करते है उतना ही पैसा एस.एफ.ए.सी. (Small Farmer Agriculture Consortium., SFAC)) कंपनी को उपलब्ध कराता है. जिसे इक्विटी ग्रांट फण्ड कहते है,जिसकी सीमा 10 लाख रुपये तक रहती है, तथा इस पैसे को कंपनी तीन बार में अपने सदस्य संख्या बढाकर ले सकती है. एक सदस्य के हिसाब से एक बार ही यह पैसे दिया जाता है.
  • प्रबन्धन पूँजी व इक्विटी ग्रांट फण्ड कंपनी को वापिस नहीं करना पड़ता है यह पैसा कंपनी के पास ही रहता है.
  • क्रेडिट गारन्टी फण्ड- एस.एफ.ए.सी. (Small Farmer Agriculture Consortium (SFAC)) किसानो को बैंक से 100 लाख तक का बिना कुछ गिरवी रखे लोन भी देता है.
  • जब कंपनी तीन साल तक चल जाये व उसका लगातार इनकम टेक्स रिटर्न भरते है तो कंपनी ऋण  के लिए बैंक में भी आवेदन कर सकती है.
  • ऋण आदि के बारे में जानकारी के लिए कंपनी बनाने से पूर्व एस.एफ.ए.सी. (SFAC) की वेबसाईट पर जाकर विस्तृत जानकारी ले सकते है व उनके कार्यालय में संपर्क कर सकते है ताकि उनकी लोन सम्बन्धी नियम व शर्ते पूरी की जा सके व उनकी योजनाओ का लाभ लेने में कोई परेशानी न हो.
  • www.sfacindia.com
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