पशुओ के रोग एवं उपचार

पशुओ के सामान्य रोग, लक्षण एवं प्राथमिक उपचार –
  • 1. रोग – मुह पकाना व छाले पड़ना
  • कारण – कोई बीमारी, कांटे लगना एवं दांत ख़राब होना.
  • लक्षण – चारा कम खाना व चारा खाना बंद करना, लार टपकना, मुह बा जीभ में छले पड़ना, बदबू आना बा जीभ बाहर आना आदि.
  • प्राथमिक उपचार – लाल पोटाश के 1% घोल से अच्छी तरह से पूरा मुह 2-3 बार धोना व ग्लिसरीन मुह में लगाना.
  • 2. पेट फूलना या अफरा
  • कारण – चारे में परिवर्तन व असंतुलित आहार, बासी खुराक, सूखे चारे के बाद हरा चारा अधिक मात्रा में खिलाना.
  • लक्षण- पशु के बाई तरफ का पेट अधिक फूलना, ढोलक जैसी आवाज आना, पशु का बार-बार उठना बैठना, लार टपकना, मुह से साँस लेना, जीभ बाहर निकालना, पेट दर्द व कराहना.
  • प्राथमिक उपचार- पशु को बैठने नहीं देना व दवाई धीरे-धीरे पिलाना.
  • तारपीन का तेल 30-50 ग्राम पिलाना.
  • मीठा तेल 500 ग्राम पिलाना.
  • हींग 10-15 ग्राम या टिपोल तेल 50 ग्राम पानी के साथ पिलाये.
  • 3.  कब्ज या पेट में गांठ पड़ जाना
  • कारण – ज्यादा सूखा चारा खाना, कम पानी पीना, गला-सडा चारा खाना.
  • लक्षण- पशु सुस्त होना, जुगाली करना बंद करना, बाई तरफ पेट फूलना व सख्त होना, गोबर कम करना या बंद होना, गोबर सख्त व सूखा होना और पेट दर्द होना.
  • प्राथमिक उपचार- 1. मैग्नेशियम सल्फेट 100-250 ग्राम, सादा नमक 100 ग्राम, गुड 250 ग्राम, 1 या 1.5 लीटर गर्म पानी के साथ देना.
  • मैग्नेशियम सल्फेट के साथ 50-100 ग्राम हिमालय बत्तीसा देना.
4. पेट में कीड़े पड़ना
  • कारण- आसपास के वातावरण में कीड़ो के अंडो के माध्यम से गन्दगी और बीमार पशु के गोबर से, अस्वच्छ पानी आदि के द्धारा.
  • लक्षण- पशु सुस्त व शक्तिहीन, गोबर पतला करना, गोबर में काला खून व कीड़े दिखना, पशु में खून की कमी, पशु के चारा खाते हुए भी शरीर की वृद्धि कम व पेट का बढ़ जाना.
  • प्राथमिक उपचार- 1. एन्टीपार – (पाईपराजीन) 5-25 मिली.
  • 2. पानाक्यूर टेबलेट – छोटा पशु 0.5 ग्राम, बड़ा पशु 1.5 ग्राम/100-150 कि.ग्रा.

    5. दस्त/अतिसार
  • कारण – यह रोग कीटाणुओं द्धारा होता है, यह एक सक्रामक रोग है. मुख्य कारण अधिक मात्रा में बछड़े को दूध पिलाने व बछड़े को गंदे व आद्र व बंद कमरे में रखने से होता है, खली न खिलाने आदि.
  • लक्षण- सफ़ेद, पतले दस्त के साथ बदबू, बछड़े का धीरे-धीरे कमजोर होना व रोग प्रचंड रूप में होने पर बछड़े का मर जाना.
  • प्राथमिक उपचार – 5 ग्राम टेबलेट स्ट्रीनासीन टेरामाईसिन या ट्रामेघप्रिम सल्पा देना चाहिए.
  • छाछ या चावल मांड को 25-50 ग्राम नेबलेन पावडर के साथ 3 बार देना चाहिए.
  • 6. मोच, सूजन, लड़खड़ाना, हड्डी का उतर जाना
  •  कारण- जानवर के फिसलने, ऊँची-नीची  जगह चलने, अधिक सामान खीचने से होता है.
  • लक्षण- शरीर के जोड़ो और मांसपेशियो स्नायु व नस में चोट के कारण लंगड़ापन और दर्द होना, सूजन आना, पशु का एक स्थान पर पड़े रहना और उठना नहीं आदि.
  • प्राथमिक उपचार- पहले वर्फ से सिकाई, 2-4 दिन होने पर नमक के गर्म पानी से सिकाई, साथ में लिनिमेह या आयोडेक्स से मालिश करके पशु को चलाना.
  • 7. सींग टूटना
  • कारण- आपस में पशुओ के लड़ने से, लाठी लगने, टक्कर लगने आदि से सींग टूट जाता है.
  • लक्षण- सींग से खून निकलना, सींग टूटना, सींग का खोल उतर जाना.
  • प्राथमिक उपचार- अगर खोल निकलता है व खून बह रहा है तो टिबेनजाइन लगाकर कस के पट्टी बांधे, टूटे सींग पर टिबेनजाइन का फाया रखकर खून बंद करे और पट्टी बांधे.
  • 8. दाद – खुजली
  • कारण- चर्म रोग, छूत से एक पशु से दुसरे को होता है.
  • लक्षण- पशु को खुजली होती है तो शरीर पर छोटे-छोटे गोल आकार के जख्म हो जाते है चमड़ी लाल हो जाती है.
  • प्राथमिक उपचार- लाल पोटाश के घोल से साफ कर गंधक का मलहम लगाये, पशु को अलग रखे.
  • थनों का फटना-
  • कारण – सर्दी के मौसम में अधिक होता है, बछड़े की लार से पशु के थन की चमड़ी का खुश्क होना, चमड़ी का फटना, दांतों से खरोच आना.
  • लक्षण- थन की चमड़ी फट जाती है, खून निकलना, थनों में सूजन व दर्द होना आदि.
  • प्राथमिक उपचार – हल्के गर्म पानी में 1% पोटाश के घोल से साफ कर दूध निकालने के बाद मलहम लगाना चाहिए और चमड़ी न सूखे इसके लिए ग्लिसरीन थनों में लगानी चाहिए.
  • 9. जू –
  • कारण- पशुओ के आपस में संपर्क में आने से, पशुओ के शेड में उपस्थित जू से, चारागाह आदि से.
  • लक्षण- पशुओ के शरीर के निचले भाग में, पूँछ व पैरो के बीच, बालों में जू खुजली करती है.
  • प्राथमिक उपचार – 250 ग्राम नीम की पत्ती व तम्बाकू की पत्ती को दो लीटर पानी में उबालकर 10 लीटर ठन्डे पानी में मिलाकर शरीर को साफ करे.
  • 10. जहरवाद/थनैला-
  • कारण – पूरा दूध थन से न निकलना, गन्दी जगह पर पशुओ जा बैठना, मिलकर द्धारा व बछड़े के दांत आदि से.
  • लक्षण – थन में सूजन, थन का फटना, थथोले पड़ना, खून व पीप निकलना आदि.
  • प्राथमिक उपचार- अधिक सूजन होने पर ठंडी बर्फ से सिकाई, दूध तुरंत खाली कर थनों में मलहम डालकर, पशु चिकित्सक को दिखाए.
  • उपचार करने से पूर्व पशु चिकित्सक से संपर्क जरूर करे.
  • धन्यवाद

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  • photo from- pexels

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