हरी खाद

Green Manure-

  • अविच्छेदित अर्थात बिना सड़े-गले दलहनी व अदलहनी हरे पौधे या उनके भागों (तना, पत्ती आदि) को जब मृदा की नत्रजन या जीवांश की मात्रा बढाने के लिए खेत में दबाया जाता है, तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते है.
  • एक बार सनई की हरी खाद देने से लगभग प्रति हेक्टर 75 क्विंटल जैव पदार्थ एवं 84 किलोग्राम नत्रजन फसल को मिलता है. सामान्यतया हरी खाद में 0.5 -1% तक नत्रजन, 0.1 -0.2% तक फोस्फोरस तथा 0.8-1% तक पोटाश की मात्रा होती है.
  • फसल का नाम – सनई
  • बुवाई का समय – अप्रैल से जुलाई
  • बीज दर – 80-100 किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 20-25 टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.75 %
  • फोस्फोरस – 0.12 %
  • पोटाश – 0.51%
  • फसल का नाम – ड़ेंचा (सेस्बानिया रोसट्रेटा )
  • बुवाई का समय – अप्रैल से जुलाई
  • बीज दर – 80-100 किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 20-25 टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.62  %
  • फसल का नाम – लोबिया
  • बुवाई का समय – अप्रैल से जुलाई
  • बीज दर – 40-50  किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 15-20  टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.71 %
  • फोस्फोरस – 0.15 %
  • पोटाश – 0.50%
  • फसल का नाम – उड़द
  • बुवाई का समय – जून  से जुलाई
  • बीज दर – 20-22  किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 10 -12  टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.85 %
  • फोस्फोरस – 0.18  %
  • पोटाश – 0.53%
  • फसल का नाम – मूंग
  • बुवाई का समय – जून  से जुलाई
  • बीज दर – 20-22  किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 8-10  टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.72 %
  • फोस्फोरस – 0.17 %
  • पोटाश – 0.53%
हरी खाद की विशेषताये-
  • जो फसल हरी खाद के रूप में उपयोग कर रहे है वो –
  • फसल कम समय में अधिक वृद्धि करने वाली होनी चाहिए.
  • फसल की जड़ मृदा में अधिक गहराई तक जाती हो.
  • फसल की वानस्पतिक वृद्धि –तने शाखा व पत्तियाँ अधिक लगती हो.
  • फसल के वानस्पतिक अंग मुलायम हो.
  • फसल की जल मांग कम हो.
  • फसल को कम मात्रा में पोषक तत्वों की जरूरत हो.
  • विषम परिस्थितियों में भी हरी खाद वाली फसल अच्छी बडवार करे.
  • फसल में कीड़े व रोग कम लगते हो.
  • भूमि को अधिक मात्रा में जीवांश पदार्थ प्रदान करती हो.
  • फसल का बीज सस्ता होना चाहिए.
  • हरी खाद देने की विधियाँ- 1. सीटू विधि – इस विधि में जिस खेत में हरी खाद उगाई जाती है उसी खेत में उसको दबा दिया जाता है. यह विधि उन क्षेत्रो में अपनायी जाती है जहा बारिश अच्छी होती है.
  • हरी पत्तियो द्धारा- इस विधि में फसल को खेत में उगाते है वो उसको काटकर अन्य दुसरे खेत में दबाते है. यह विधि उन क्षेत्रो में अपनायी जाती है जहा नमी कम होती है.
  • हरी खाद के लिए उपयुक्त फसल-
  • दलहन फसले- मुख्य फसले- सनई , ड़ेंचा .अन्य फसले-मेंथी, मसूर,खेसारी, सेंजी, मटर, बरसीम आदि.
  • अदलहनी फसले- जई, जौ, राई, सरसों शलजम आदि हरी खाद के रूप में उपयोग की जाती है.
  • हरी खाद की पलटाई का समय – जब फसल परिपक्व न हुई हो तथा फसल में फूल निकलना प्रारंभ हो गए हो तब पलटाई की जाती है इस समय फसल मुलायम रहती है खेत में जल्दी सड जाती है.
  • सनई की फसल बुवाई के 50 दिन बाद व ड़ेंचा 45 दिन बाद खेत में पलटने के लिए तैयार हो जाता है.
  • पलटने की विधि- खेत में मिट्टी पलटने वाला हल चलाकर पाटा चलाकर अच्छी तरह दबा देना चाहिए.
  • अगली फसल की बुवाई का समय- हरी खाद को पलटने के 30-40 दिन बाद अगली फसल बोनी चाहिए.
  • हरी खाद के लाभ – मृदा में जैविक पदार्थ व नत्रजन की मात्रा बढाता है.
  • मृदा में पोषक तत्वों का सरक्षण करता है.
  • पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि करता है.
  • मृदा सतह का सरंक्षण करता है.
  • खरपतवार का नियंत्रण करता है.
  • लवणीय व क्षारीय भूमियो में सुधार करता है.
  • फसल संरचना व फसल उत्पादन में वृद्धि करता है.
  • लागत कम लगती है.

धन्यवाद- Thanks

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