किसान उत्पादक कंपनी

फार्मर्स प्रोडूसर कंपनी

  • यह कम्पनी प्राथमिक उत्पादको दयारा बनाई जाती. इस कंपनी को फसल, सब्जी, फल, दूध, मछली, मुर्गी आदि उत्पादन करने वाले किसान आसानी से बना सकते है.
  • यह एक वैधानिक संस्था है जिसमे इसके सदस्यों को ही इससे लाभ या बचत का फायदा मिलता है. इस लाभ को वो लोग आपस  में बाट सकते है और अपने लिए एक नया व ज्यादा लाभ या कमाई का स्रोत पैदा कर सकते है.
  • बीज उत्पादक कंपनी के फायदे- जब अकेला किसान अपनी कम फसल को बेचता है तो उसको लाभ कम मिलता है. अगर किसान कम्पनी बनाकर कही बाहर या ऊंचे भाव वाली मंडी में बेचते है, तो उनको लाभ ज्यादा होता है. सभी किसान फसल उत्पादन करते है यदि ये लोग कंपनी के दयारा बीज उत्पादन या फल सब्जी, दूध आदि की प्रोसेसिंग करते है, तो उनको लाभ ज्यादा मिलता है. किसान कम्पनी के माध्यम से बीज, खाद, दवाई आदि का लाइसेंस लेकर, इकठठा खरीदकर आपस में सदस्य या गाँव के किसानो को बेंचते है तो उनको कीमत कम लगती. अगर कोई नये यंत्र या यंत्रो को खरीदकर किराये पर देने से किसानों की उपज बढेंगी. नयी फसल या तरीका को अपनाने व बाद में उपज को बेंचने में भी किसान को सुविधा रहती है.
  • किसान उत्पादक कंपनी कैसे बनाए
  • कंपनी बनाने के लिए कुछ किसान जो थोड़े पढ़े लिखे हो वो लोग अपने गाँव या समीप के गाँव के लोगो का समूह बनाये. इन लोगो के साथ  दो या तीनबार  बैठक करे व उनसे कंपनी बनाने व उसके फायदों के बारे में चर्चा करे. कंपनी बनाने के लिए 33 % से अधिक सीमांत ( जिनके पास एक हेक्टर से कम जमीन है) व लघु (जिनके पास 1-2 हेक्टर जमीन हो) किसान कंपनी के सदस्य होने चाहिए ताकि कंपनी को सरकार से मिलने वाली छूट का लाभ भी मिल जाये. इसमें ध्यान ये रखे की किसान समान सोच व रूचि वाले होने चाहिए तथा उनके अन्दर अपनी खेती से ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की इच्छा/चाहत हो, ताकि कंपनी को आसानी से चलाया जा सके.
  • अब उस गाँव के ग्रुप में से ही एक आदमी का चुनाव करे जो किसानों की सामान्य जानकारी इकठठा कर सके व बाद में कोई सूचना या जानकारी आये तो लोगो तक उसको पहुंचा सके.
  • बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर का चुनाव – बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर का चुनाव कंपनी में शामिल होने वाले लोगो में से ही सर्वसम्मति से करते है, यह थोड़े पढ़े लिखे व कम्पनी को चलाने में सक्षम हो. बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर की संख्या 5 से लेकर 15 तक हो सकती है. इस बोर्ड में एक या दो महिला भी होनी चाहिए.
  • अध्यक्ष व सचिव का चुनाव- चुने गए बोर्ड डायरेक्टर में से अध्यक्ष व सचिव का चुनाव करते है. ये लोग हस्थाक्षरी ऑथोरिटी होते है व बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर के साथ मिल कर कम्पनी चलते है.
  • कंपनी के सदस्य- कोई भी प्राथमिक उत्पादक कंपनी का मेम्बर हो सकता है. एक घर से केवल एक ही आदमी कंपनी का  सदस्य हो सकता है. कंपनी में जितने ज्यादा सदस्य होंगे उतना अच्छा है. शुरूआत में 250-500 मेम्बर से कंपनी शुरू कर सकते है. बाद में सदस्य संख्या बढ़ाते रहे. एक कंपनी में कम से कम 10 सदस्य हो सकते है तथा अधिकतम सदस्यों की कोई सीमा नहीं है.
  • कंपनी का पंजीयन- अपनी जान पहचान या अपने जिले में किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट (सी.ए.) तलाशे. यह सी.ए. कंपनी का पंजीयन करवा देंगे.
  • कागजात- सी.ए. को प्राथमिक उत्पादक/ किसानों की सूची जो कंपनी में सदस्य बनना चाहते है, बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर व अध्यक्ष, सचिव का  नाम, पेन कार्ड, आधार नंबर, पता आदि के कागजात उपलब्ध कराये ताकि वह कंपनी का पंजीयन करा सके.
  • पंजीयन फीस – कंपनी के पंजीयन में लगभग 40000 (चालीस हजार रुपये) रुपये का खर्चा आता है, इसमें पंजीयन की फीस, सी.ए. की  फीस व स्टाम्प आदि के खर्चे आते  है.
  • कंपनी बनाते समय कंपनी के पास 100000 (एक लाख रुपये) रुपये होने चाहिए जिसे पेड अप कैपिटल कहते है.
  • यह पैसा सदस्य किसानों से एकत्रित किया जाता है. एवं कंपनी को चलाने, व्यापार करने व अन्य खर्चो के लिए भी पैसा सदस्य किसानों से एकत्रित करते है तथा उनको कंपनी में शेयर होल्डर बनाया जाता है. बाद में जो भी कंपनी में लाभ होता है, उतना शेयर के अनुपात में लाभ का वितरण किया जाता है.
  • दो या तीन महीने के अन्दर कंपनी का पंजीयन हो जाता है. अब कंपनी के सदस्य व्यापार शुरू कर सकते है.
  • बिज़नेस प्लान- अब कंपनी सदस्य मिलकर व्यापार की रूपरेखा बनाये की इसके अन्दर किसका व कितनी मात्रा में व्यापार करना है.
  • कंपनी का व्यवसाय- कंपनी बनाने के बाद निम्नलिखित प्रकार के व्यापार कर सकते है.
  • बीज प्रमाणीकरण – बीज उत्पादन, प्रोसेसिंग, पैकिंग,मार्केटिंग आदि.
  • खाद, बीज, दवाई का लाइसेंस लेकर किसानों को बेंचना.
  • कृषि उत्पाद को खरीदकर किसी ज्यादा भाव वाले बाजार में बेचना.
  • कृषि उत्पाद का ब्रांड बनाना, पैकेजिंग, मानकीकरण, लेबलिंग एवं मार्केटिंग.
  • कृषि उत्पाद की प्रोसेसिंग करके नया उत्पाद बनाना व बेंचना.
  • डेयरी, दुग्ध उत्पादन, मधुमक्खी पालन, रेशम पालन, मुर्गीपालन या अन्य व्यवसाय.
  • किसानों के उत्पादन व उपलब्धता के आधार पर अन्य कोई व्यवसाय.
  • कृषि उत्पादो का निर्यात.
कंपनी को आर्थिक सहयोग
  • कंपनी के सदस्यों से पैसा एकत्रित करे.
  • प्रबन्धन पूँजी- शुरूआती समय में कंपनी के लिए फर्नीचर, लेखन सामग्री आदि के लिए स्माल फार्मर्स एग्रीकल्चर कंसोर्टियम (एस.एफ.ए.सी., Small Farmer Agriculture Consortium., SFAC) लगभग 3.5 लाख रुपये देता है.
  • इक्विटी ग्रांट फण्ड- जितना कंपनी के सदस्य पैसा एकत्रित करते है उतना ही पैसा एस.एफ.ए.सी. (Small Farmer Agriculture Consortium., SFAC)) कंपनी को उपलब्ध कराता है. जिसे इक्विटी ग्रांट फण्ड कहते है,जिसकी सीमा 10 लाख रुपये तक रहती है, तथा इस पैसे को कंपनी तीन बार में अपने सदस्य संख्या बढाकर ले सकती है. एक सदस्य के हिसाब से एक बार ही यह पैसे दिया जाता है.
  • प्रबन्धन पूँजी व इक्विटी ग्रांट फण्ड कंपनी को वापिस नहीं करना पड़ता है यह पैसा कंपनी के पास ही रहता है.
  • क्रेडिट गारन्टी फण्ड- एस.एफ.ए.सी. (Small Farmer Agriculture Consortium (SFAC)) किसानो को बैंक से 100 लाख तक का बिना कुछ गिरवी रखे लोन भी देता है.
  • जब कंपनी तीन साल तक चल जाये व उसका लगातार इनकम टेक्स रिटर्न भरते है तो कंपनी ऋण  के लिए बैंक में भी आवेदन कर सकती है.
  • ऋण आदि के बारे में जानकारी के लिए कंपनी बनाने से पूर्व एस.एफ.ए.सी. (SFAC) की वेबसाईट पर जाकर विस्तृत जानकारी ले सकते है व उनके कार्यालय में संपर्क कर सकते है ताकि उनकी लोन सम्बन्धी नियम व शर्ते पूरी की जा सके व उनकी योजनाओ का लाभ लेने में कोई परेशानी न हो.
  • www.sfacindia.com
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SRI Method of Sowing in Mustard Crop

SRI in Mustard

  • System of root Intensification in Mustard
  • System of Mustard Intensification
  • Mustard is a major oil crop. Oil of mustard is used in cooking.
  • When mustard grain is crushed in oil mil, then as a byproduct cake of mustard comes out which is used as feed to animal. The cake increases the quantity and quality of milk in the animal.
  • Mustard is a major Rabi season crop. Rajasthan is a highest producer of mustard in India.
  • SRI Method of Sowing in Mustard Crop- This is a method of sowing when uses in mustard crop, gives more yield in comparison to normal sowing. In this method nursery is prepared and seedlings are planted in the field.In this method farmers must select high yielding varieties. There are so many private companies which are selling good varieties of mustard crop or may be purchased from else.
  • Material used for sowing in one hectare-
  • Seed 250 gram.
  • 500 ml. gomutra (urine of cow)
  • 500 gram vermi compost/ earthworm compost.
  • 100 gram Gud (jaggery).
  • 1 gram carbendazim or 5 gram trico-derma.
  • 500 ml lukewarm water.
  • Preparation of nursery-
  • Take 500 ml hot water and mix seed of the mustard with water, some shallow or waste seed will float on the water. Remove these waste seed. Now mix gomutra, vermi-compost, and jaggary in the mixture. Now mix these items thoroughly and leave this mixture for six hours in shadow.
  • After this, filter this mixture with the help of cotton cloth.
  • After this treat the seed with Carbendazim or Trichoderma.
  • Now tie this mixture in a wet clothe or jute bag and leave this for 12 hours.
  • After 12 hours the seed will germinate and ready to planting in nursery.
  • Sowing in nursery- Make a sufficient size nursery. Use compost or vermin compost to prepare nursery, and sow these germinated seed.
  • The seedlings are ready to planting in field after 15 to 20 day.
  • The farmer should prepare the field by ploughing and leveling before the planting of seedlings.
  • Manure and Fertilizers- Use 20-30 quintal compost or vermicompost and nitrogen 60 Kg., Phosphorus 40 Kg., Potash 20 Kg., and sulphar 25 Kg./hectare.
  • Mix these all in the field at the last ploughing during the field preparation.
  • Half of the nitrogen quantity is used as basal dose and half the nitrogen is given at the time of irrigation.
  • Planting of seedlings- the seedlings are planted in the field at the distance of 3 feet row to row and 3 feet plant to plant.
  • So the spacing is 3*3 feet in sowing.
  • Weed control- weed control is done manually by the help of khurpi or by hand wheel weeder. This improve the aeration in root of the plant and earthen the plant too.
  • Irrigate as per the need.
  • Benefit of SRI method-
  • The production of crop increased, using this method of sowing.
  • The seed rate remains very low in comparison to normal sowing.
  • Weed, diseases and insect control are easy because spacing is more in between the plants and rows.
  • the weeds remain very low in such type of sowing.
  • In this method the growth and branching in plant are high so the yield is more.

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श्री विधि से सरसों की बुवाई

  • System of root Intensification in Mustard-
  • System of Mustard Intensification-
  • SRI in Mustard
  • सरसों एक मुख्य तेलीय फसल है जिसमे से तेल निकलता है जो खाना बनाने में इस्तेमाल किया जाता है.  सरसों के दानों को जब मिलिंग करके तेल निकाला जाता है तो उससे बाई प्रोडक्ट के रूप में खली निकलती है जो दुधारू पशुओ के खिलायी जाती है, इस खली  के प्रयोग से पशु दूध ज्यादा देते है. सरसों रबी सीजन की एक मुख्य फसल है, हमारे देश में राजस्थान राज्य इसका सबसे ज्यादा उत्पादक राज्य है.

श्री विधि से सरसों की बुवाई

  • जड़ सघनता प्रणाली
  • यह सरसों में अधिक उत्पादन लेने की विधि है. बुवाई की इस विधि का प्रयोग करने पर फसल के उत्पादन में  वृद्धि होती  है. इसमें सरसों की नर्सरी तैयार की जाती है. जिसका बाद में खेत में रोपण किया जाता है.
  • इस विधि में उच्च उपज वाली किस्मों का प्रयोग करना चाहिए, अभी प्राइवेट कंपनी के बीज अच्छी उपज वाले आते है इसलिए इनका बीज प्रयोग कर सकते है. या अन्य कही से भी उन्नत किस्म का बीज खरीदकर भी प्रयोग कर सकते है.
  • एक हेक्टर में उपज के लिए सामग्री-
  • बीज 250 ग्राम
  • 500 मिलीग्राम गोमूत्र
  • 500 ग्राम वर्मी कम्पोस्ट/ केंचुए का खाद
  • 100 ग्राम गुड़ ( मीठा गुड)
  • 1 ग्राम कारबेंडाजिम या 5 ग्राम ट्राईकोडर्मा (बीजो उपचार के लिए)
  • 500 मिलीलीटर गर्म पानी
  • रोपणी तैयार करने की विधि- 500 मिलीलीटर पानी को गुनगुना होने तक गर्म करे व इसमें बीज को डाल दे, बीजो को हिलाए इससे ख़राब व थोथले बीज पानी के ऊपर तैरते है, उनको निकाल कर फेंक दे.
  • अब इस बीज व पानी के घोल में गोमूत्र, वर्मी कम्पोस्ट व गुड को डालकर हिलाए, गुड थोड़े से गर्म पानी में घोलकर भी डाल सकते है. अब इस मिश्रण को 6 घंटे के लिए छाया में रख दे.
  • इसके बाद इस घोल को छानले व इस बीज में में कारबेंडाजिम या ट्राईकोडर्मा से बीज उपचार करे.
  • इसके बाद इस मिश्रण को एक पोटली या हलके से गीले बोरे में बांधकर 12 घंटे के लिए लिए रख दे. 12 घंटे के बाद बीज अंकुरित हो जाते है.
  • नर्सरी की तैयारी- अब एक पर्याप्त साइज़ की थोड़ी ऊंचाई की नर्सरी तैयार करे. इसमें अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट डाले. इसके बाद अकुरित बीजो को नर्सरी में बोये. व बीजों को भी खाद से अच्छी तरह से ढक दे.
  • 15-20 दिन में पौधे खेत में रोपने के लिए तैयार हो जाते है.
  • इससे पहले किसान को खेत को जुताई करके, समतल करके बुवाई के लिए तैयार कर लेना चाहिए.
  • खाद व उर्वरक-
  • जैविक खाद 25 क्विंटल/हेक्टर व  रासायनिक उर्वरक 60-80 :40: 20: 25 नत्रजन, फोस्फोरस, पोटाश व सल्फर प्रति हेक्टर प्रयोग करते है.
  • सल्फर से सरसों में तेल की मात्रा, दानों का वजन बढता है.
  • जैविक खाद व उर्वरको को बुवाई से पूर्व ही खेत की अंतिम तैयारी के समय मिला दिए जाते है.
  • केवल नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के समय व आधी मात्रा पहली सिंचाई के समय प्रयोग करते है.
  • पौधों का रोपण- तैयार किये गए खेत में 3*3 फीट की दूरी पर पौधों का रोपण करते है, इसमें पौधे से पौधे की दूरी 3 फीट व लाइन से लाइन की दूरी 3 फीट रखी जाती है.
  • खरपतवार का नियंत्रण- इसमें हाथ खुरपी की सहायता से या हैण्ड व्हील वीडर आदि से खरपतवार का नियंत्रण करते है. इससे भूमि में हवा का संचार बढ जाता है व पौधों पर मिट्टी भी चढ़ जाती है.
  • सिंचाई- आवश्यकता अनुसार सिंचाई करे.
  • श्री विधि से बुवाई के फायदे-
  • इस तरह बुवाई करने से फसल की उपज बहुत ही अच्छी आती है.
  • सामान्य बुवाई की तुलना में इस तरह बोने से बीज दर बहुत ही कम लगती.
  • पौधों के बीच दूरी ज्यादा रहती है इसलिए खरपतवार का नियंत्रण करना बहुत ही आसान है. रोग व कीड़ो का नियंत्रण करना भी आसान है.
  • पौधों की बडवार अच्छी होती है, पौधे में शाखाये ज्यादा लगती जिससे फलन भी ज्यादा होता है.

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Farming of Sweet Corn Maize

Production Technique of Sweet Corn Maize-

Cultivation of Sweet Corn Maize,

  1. We all know about the production of the maize because in most of the state of our country, sowing of maize is done. Today we are going to discuss about cultivation of sweet Corn Maize.
  2. The production of this maize is same as production of common maize. Sweet corn is grown for production of green cobs which are sale in the market. The cob of this maize is very sweet in comparison to common maize. The rate of it cob is higher than the cob of common maize. So by growing sweet corn farmers can earn more/Acre.
  3. Sowing of sweet corn- the field is prepared with plough and leveled by the leveler. Then the dibbling of seed is done by hand with the help laborers.
  4. Spacing- it is sown 60*30 centimeters distance row to row and plant to plant.
  5. Seed rate- the seed rate is 2.5 to 3 kilogram/acre.
  6.  The cost of seed is very high in comparison to normal maize.
  7. Seed cost is 2000-2500 Rs. /Kg.
  8. Time of sowing-Now a days the maize can be sown in any Rabi, kharif and Zaid season. But farmers have to take care in sowing that the crop of sweet corn is sown some earlier to main season because the production of the maize is done for selling of the green cob so if the cobs come in the market some earlier than the rate of the cobs is higher.
  9. Sweet Corn Cob- After 60-75 days of sowing, the cob of the maize is ready to harvesting. Harvest the cob and sale it in the market.
  10. Rate of the green cob- the rate of the cobs is 20-30 Rs. /Kg in the mandi at wholesale rate. If the farmers sale these cobs in retail than the rate will be 50-60 Rs. /kg. So farmers can sale these cobs as per is ease. This rate is very high in comparison to cobs of normal maize cob which rate is very lower.
  11. Income from the green cobs sale- by the sowing of the sweet corn a farmer can earn 40-60 thousand/acre.
  12. The cobs are eaten by roasting the cob over fire. The corn cobs are very sweet in taste so the people like very much to eat the green cobs.
  13. In this case the field also becomes vacant early so farmers can grow next crop on this the same field and can earn more in same time period.
  14. The crop growing duration of sweet corn is 70-80 days only. The fertilizer given to the crop is also utilized by next crop too.

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स्वीट कॉर्न मक्का की खेती

स्वीट कॉर्न मक्का की उत्पादन तकनीकि

स्वीट कॉर्न मक्का- इस मक्का का उत्पादन सामान्य मक्का के उत्पादन के सामान ही होता है. लेकिन स्वीट कॉर्न मक्का का भुट्टा बहुत ही मीठा होता है जिसको आग पर सेक के खाया जाता है. चूकि इसका भुट्टा सामान्य मक्का की तुलना में ज्यादा मीठा होता है तो लोगो दयारा ज्यादा पसंद किया जाता है, इसका हरा भुट्टा बाजार में ज्यादा महंगा बिकता है इसलिए किसान को ज्यादा भाव मिलने के कारण इस मक्का को बोने से ज्यादा लाभ मिलता है. व किसान प्रति एकड़ ज्यादा लाभ कमाता है.

  • स्वीट कॉर्न मक्का का उत्पादन- ज्यादातर राज्यों में सामान्य मक्का का उत्पादन किया जाता है इसलिए सभी लोग मक्का के उत्पादन के बारे में अच्छे से जानते है.
  • बीज दर- इसमें बीज दर 2-3 किलोग्राम/एकड़ रखी जाती है. व मक्का की चुपाई 60*30 सेंटीमीटर या 45*45 सेंटीमीटर पर हाथ से की जाती है. इसके लिए पहले खेत को जुताई करके पाटा चलाके. फिर बुवाई की जाती है.
  • बीज की कीमत- इसका बीज लगभग 2000 से 2500 हजार रुपये किलो मिलता है. जो की सामान्य मक्का के बीज की तुलना में कई गुना महंगा रहता है.
  • फ़र्टिलाइज़र की मात्रा- 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 24 किलोग्राम फोस्फोरस एवं 15 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करते है.
    100 किलोग्राम डी.ए.पी. में 18 किलोग्राम नाइट्रोजन व 46 किलोग्राम फास्फोरस रहता है,
    100 किलोग्राम यूरिया के बोरे में 46 किलोग्राम नाइट्रोजन रहता है.
    व 100 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटास के बोरे में 60 किलोग्राम पोटाश रहता है इनका कॉम्बिनेशन बनाकर खाद की पूर्ति कर सकते है.
  • बुवाई का समय- अभी मक्का को किसी भी मौसम रबी, खरीफ व जायद में लगा सकते है लेकिन स्वीट कॉर्न मक्का को अगर थोडा पहले लगाया जाये तो इसका भाव ज्यादा मिलता है.
  • स्वीट कॉर्न- इस मक्का की फसल हरे भुट्टे बेचने के लिए लगाई जाती है. बुवाई के 65-70 दिन बाद भुट्टे तैयार हो जाते इनको तोड़कर बाजार में बेच देते है.
  • मंडी में थोक में बेचने पर भुट्टे 20-30 रुपये किलो व फुटकर में बेचने पर 50-60 रुपये किलो बिकते है.
  • किसान इस तरह हरे भुट्टे बेचकर 40- 60 हजार प्रति एकड़ या ज्यादा आसानी से कमा सकते है.
  • इस मक्के के भुट्टो को आग पर पकाकर/सेककर खाते है जो बहुत ही मीठे लगते है. जो इसके भुट्टो को खाना बहुत पसंद करते है.
  • तथा किसान का खेत जल्दी खाली हो जाता है तो वह उसमे अगली फसल भी पका सकता है.

 

एग्री-क्लीनिक एवं एग्री बिज़नेस ट्रेनिंग

  • एग्री-क्लीनिक एवं एग्री बिज़नेस ट्रेनिंग-

यह एक ट्रेनिंग है जिसमे कृषि से शिक्षा प्राप्त उम्मीदवारो को प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वो लोग अपना खुद का व्यवसाय स्थापित कर सके है.

  • इसमें कृषि व किसानों से सम्बंधित चीजो का बिज़नेस स्थापित करना सिखाया जाता है.
  • इसके मुख्य उद्धेश्य यह है की जो कृषि से शिक्षा प्राप्त करके कॉलेज आदि से निकलते है उनको इस ट्रेनिंग के बाद आसानी से रोजगार मिल जाये.
  • चूकि इस लोगो ने कृषि में शिक्षा ली होती है तो वो लोग इस व्यवसाय के माध्यम से अपने ज्ञान का किसानों के हित में सदुपयोग कर सकते है.
  • यह ट्रेनिंग दो महीने ( 60 दिन) की होती है जिसमे ट्रेनिंग लेने वालो लोगो को रहना व खाना फ्री रहता है, उनको किसी प्रकार का खर्च नहीं करना पड़ता है इस ट्रेनिंग के लिए.
  • उम्मीदवार को उसी इंस्टिट्यूट के हॉस्टल में रहकर ट्रेनिंग प्राप्त करता है इसलिए वह आसानी से ट्रेनिंग कर सकता है व बिज़नेस की प्रक्रिया अच्छी तरह समझ सकते है.
  • संकल्पना-
  • एग्री-क्लीनिक- इसमें कुछ छोटे टाइप के बिज़नेस रहते है तथा किसानो को तकनीक व सलाह आदि के बिज़नेस इसके अंतर्गत आते है.
  • एग्री बिज़नेस- इसमें कुछ बड़े प्रकार के बिज़नेस आते है जिसमे कुछ निर्माण इकाईया आती है जिनमे कुछ प्रोडक्ट का निर्माण किया जाता है, जिसका कच्चा सामान कृषि से आता है, व विक्रय किसी को भी कर सकते है.
  • इसमें जिस प्रकार का बिज़नेस उम्मीदवार स्थापित करना चाहते है उसमे आवेदन कर सकते है.
  • ट्रेनिंग करने के लिए योग्यता-

  • जो व्यक्ति कृषि या कृषि से सम्बंधित अन्य विषय में स्नातक है.
  • जो लोग बायोलॉजी से स्नातक है एवं कृषि से स्नाकोत्तर है.
  • जिनके कृषि में बारहवी में 55% से ज्यादा मार्क्स है.
  • एवं वो लोग जिनका कृषि में कोई डिप्लोमा है.
  • यह सभी उम्मीदवार इस ट्रेनिंग के आवेदन कर सकते है.
  • ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट- यह ट्रेनिंग का प्रबन्धन पुरे देश में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एग्रीकल्चर एक्सटेंशन मैनेजमेंट (National Institute of Agriculture Extension Management (MANAGE) Hyderabad) हैदराबाद करता है. इस ट्रेनिंग को कराने के लिए मैनेज इंस्टिट्यूट देश के लगभग सभी राज्यों में नोडल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट स्थापित या फ्रेंचाईजी देता है, अत इन नोडल इंस्टिट्यूट में उम्मीदवार के राज्य में उनको ट्रेनिंग दी जाती है.
  • आवेदन करने व चुनाव का तरीका-
  • इस ट्रेनिंग में आवेदन करने के लिए उम्मीदवार को ऑनलाइन इन दो वेवसाईट पर जाकर आवेदन करना होता है.
  • agriclinics.net
  • manage.gov.in
  • चूकि हर राज्य में ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट रहता है वहा जाकर भी आवेदन के साथ अपने कागज जमा करके आवेदन कर सकते है.
  • अपने राज्य के नोडल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट का पता व संपर्क नंबर जानने के लिए मैनेज की वेबसाइट पर जाकर देख सकते है. यहाँ पर सभी राज्यों के सेंटर की सूची (लिस्ट ) दी हुई रहती है.
  • आवेदन करने के बाद सेंटर फ़ोन करके उम्मीदवारों को इंटरव्यू के लिए बुलाते है व इंटरव्यू के बाद उनका चुनाव किया जाता है, व कुछ समय बाद ट्रेनिंग शुरू की जाती है.
  • एक बार में एक बैच में 35 लोगो का चुनाव किया जाता है, संख्या ज्यादा होने पर दुसरे बैच में शेष को ट्रेनिंग दी जाती है.
  • वित्तीय सहायता-

  • ट्रेनिंग के दौरान उम्मीदवार को अपने बिज़नेस से सम्बंधित प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवाई जाती है, जिसमे उस व्यवसाय में लगने वाली लागत का अनुमान रहता है. यह प्रोजेक्ट नोडल इंस्टिट्यूट की मदद से बैंक में जाकर देना पड़ता है. इसके बाद उम्मीदवार को बैंक से लोन मिलता है.
  • व्यक्तिगत उम्मीदवार को 20 लाख तक का लोन उसके व्यवसाय के लिए बैंक से मिल सकता है. इससे कम रुपये का लोन भी ले सकते है.
  • यदि पांच प्रशिक्षित उम्मीदवार इकठठा होकर एक बिज़नेस करते है तो उनको 100 लाख तक का लोन मिल सकता है.
  • ऋण का भुगतान व अनुदान-

  • लिए गए लोन का भुगतान 5-10 साल के अन्दर करना रहता है,
  • तथा इसमें लिए लोन की राशी का 44 % तक अनुदान महिला, अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति व नार्थ इस्ट (उत्तर पूर्व के लोग ) के लोगो के लिए मिलता है.
  • व अन्य लोगो के ऋण की राशि का 36% तक अनुदान मिलता है.
  • एग्री क्लिनिक व एग्री बिज़नेस के अन्तरगत ट्रेनिंग-
  • मिट्टी व जल परिक्षण प्रयोगशाला.
  • खाद, बीज दवाई आदि की दुकान.
  • टिश्यू कल्चर से पौधे तैयार करने की प्रयोगशाला.
  • कस्टम हायरिंग सेंटर ( कृषि यंत्रो सेंटर स्थापित करके उनको अन्य किसानो को किराये से देना)
  • बायो फ़र्टिलाइज़र व पेस्टिसाइड की उत्पादन यूनिट.
  • मुर्गी व मछली की हेचरी ( इसके बच्चे बेचना ).
  • पशु चिकित्सा केंद्र.
  • उधानिकी नर्सरी, कोल्ड स्टोरेज व्यवसाय..
  • डेरी , रेशमपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन.
  • मछली पालन, मशरूम उत्पादन., बीज उत्पादन,
  • व अन्य कृषि व्यवसाय.

Agri-Clinics and Agri-Business Training

Agri-clinics and Agri-Business Training-

  • This is a training course in which agriculture related persons are provided training so that they can establish their own business.
  • In this training the persons are trained about businesses which are related to agriculture.
  • The main motive behind it, is to provide employment to the agriculture persons so that these agriculture students can serve farmers in better ways.
  • These persons are already remain agriculture educated, when this training is provided to them this helps them to understand the business in better ways, so they are able to run the business using their education in the development of agriculture and the farmers status too.
  • This training is for two month. In this training students are provided lodging and boarding at free of cost.
  • The students have to attend class by living in the institute hostel.
  • So they can learn the business strategy and handling of business.
  • Concepts-

  • Agri-clinics- these are small size businesses and provide technologies and services to the farmers.
  • Agri-Business- these are kept for some big type industry. In which some product are produced which may be used by anyone but the raw material comes from the agriculture.
  • But the training aspirant should not be confused, he can take part in any agriculture business.
  • All the students are provides training of both in one class in the institute.
  • Eligibility for Candidates-

  • The aspirants should be graduate in agriculture and allied (fisheries, veterinary, horticulture and others).
  • He may be graduated from biology, but must be post graduated in agriculture and allied.
  • An aspirant should have diploma in agriculture and allied.
  • 12 th pass aspirant above 55% marks.
  • The persons who have above given eligibility can apply for this training.
  • Training Institute- This training is managed by National Institute of Agriculture Extension Management (MANAGE) Hyderabad. This institute establishes Nodal Training institute in states where the student of same state can apply and can take training for these courses.
  • Process of Apply and selection of Candidates-

  • To take part in this training, candidate will have to apply online on these websites-

www.agriclinics.net

www.manage.gov.in

  • There is another way to apply to this training. There is a nodal training institute in every institute where candidate can apply offline by submitting his document with the application form.
  • If the candidates apply online their application is forwarded to the nodal institute of his state. So there is no matter how candidate apply.
  • The list and address of the nodal institute can be seen on manage website.
  • After the application, candidates are called to come to institute where an interview is taken, and then candidates are selected for the training.
  • In each batch there is 35 candidates are selected for training.
  • Financial Support for Business after Training-

  • After this training a trained candidate can take a loan 20 lakh rupees. And a group of trained candidates can take up to 100 lakh rupees.
  • The trained candidate will have to invest 10 % of the project cost.
  • Payment and Subsidy on Loan-

  • Repayment of the loan can be done up to 5-10 years.
  • Subsidy is provided up to 44 % of the project cost to the women, SC/ST & all categories of candidates from north east and hill states.
  • Subsidy will be 36% of the project cost to the other candidates.
  • Training Under Agri-Clinics & Agri-Business-

  • Extension consultancy services • Soil and water testing laboratories • Shop of Agriculture input (fertilizer, Pesticides, Seed, machinery etc.)• plant Micro-propagation units. • Custom hiring centre • Seed production and processing units; • Vermi culture units; • Production of bio-fertilizers, bio-pesticide • Bee-Keeping • Agricultural insurance services; • Agri tourism • Agri journalism • Poultry and fishery hatcheries; • veterinary services • Feed production, marketing and testing units. • Cool chain of cold storage Post harvest management centers. • Horticulture nursery, landscaping, floriculture • Sericulture; • Vegetable production and marketing; • Retail marketing outlets for processed agri-products. • Mushroom production; • Production, processing and marketing of medicinal and aromatic plants; • Production units like dairy, poultry, piggery, fisheries, sheep rearing, goat rearing, emu rearing, rabbit rearing etc.

 

श्री विधि से गेहू की बुवाई

Sowing of Wheat by SRI Method
  • यह गेहू बोने की एक विशेष विधि है. जिसमे बीज को उपचारित करके बोया जाता है, जिसके कारण उसमे रोग व कीड़े नहीं लगते है व बीज के अंकुरण प्रतिशत में वृद्धि होती है, जिससे उत्पादन में वृद्धि होती.
  • फसल की बडवार दर भी ज्यादा रहती है.
  • फसल ज्यादा स्वस्थ व ओजस्वी रहती है
  • इस विधि से बुवाई में बीज की दर कम रहती जिसके कारण सामान्य बुवाई की तुलना में कम बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है. अत किसान को बीज के पैसो की बचत होती है.
  • चूकि सामान्य बुवाई की तुलना में लाइन से लाइन व पौधे से पौधे की दूरी ज्यादा रहती है इसलिए खरपतवार नियंत्रण में आसानी रहती है.
  • इस विधि से बोने से पौधों से निकालने वाले कल्लो की संख्या ज्यादा रहती है इसलिए ज्यादा बालिया लगने के कारण उपज में वृद्धि होती है.
  • इस विधि से बोने पर फसल में बालीयों की लम्बाई ज्यादा रहती है जिससे प्रति बाली दानों की संख्या ज्यादा रहती है व उपज में वृद्धि होती है.
  • बीज का चुनाव– इस विधि से बीज बुवाई के लिए प्रमाणित व उन्नत किस्म के बीज का उपयोग करते है.
  • बीज दर – 10 किलोग्राम/एकड़.
  • श्री विधि से बुवाई के लिए बीज उपचार के लिए सामग्री
  • 10 किलोग्राम उन्नत किस्म का बीज.
  • 20 लीटर गर्म (कुनकुना) पानी.
  • पांच किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट/केंचुए का खाद
  • एक किलोग्राम गुड
  • गोमूत्र 4 लीटर
  • कारबेंडाजिम 20 ग्राम. या ट्राईकोडर्मा 50 ग्राम.
  • बीज उपचार की विधि
  • दस किलोग्राम बीज ले, इसमें पड़े कंकड़, पत्थर आदि को निकालकर बीज को साफ करे.
  • एक बर्तन में 20 लीटर पानी लेकर उसका हल्का गर्म करे एक उबल आने तक.
  • अब साफ बीज को को इस गर्म पानी में डाले व पानी में ऊपर तैर रहे हलके व खोखले बीजो को निकालकर बाहर फेंक दे.
  • अब इस पानी में 5 किलोग्राम केंचुए की खाद, एक किलोग्राम गुड, 4 लीटर गोमूत्र मिलकर हिलाए व गुड व खाद को अच्छी तरह पानी में घोल दे अब इस मिश्रण को 8 घंटे के लिए छाव में रख दे.
  • 8 घंटे बाद इस मिश्रण को छानकर गेहू को अलग करे.
  • बीज व अन्य मिश्रण में कारबेंडाजिम या ट्राईकोडर्मा से किसी एक को बीज के साथ मिला कर बीज उपचार करे.
  • इसमें बाद इस इस गेहू को किसी गीले बोरे या कपडे में बांधकर 20 घंटे के लिए रख दे.
  • 20 घंटे बाद बीज अंकुरित हो जायेंगे. इन अंकुरित बीजो का उपयोग बुवाई के लिए करे.
  • श्री विधि से गेहू की बुवाई-
  • बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए ताकि अंकुरित बीज खराव न हो. खेत में पलेवा (बुवाई से पूर्व सिंचाई करना) करके खेत में बीज बोना चाहिए.
  • बोने के लिए दूरी
  • लाइन से लाइन की दूरी 8 इंच व
  • पौधे से पौधे के बीच की दूरी 8 इंच रखी जाती है.
  • इस दूरी पर हलके से छेद करते है व एक छेद में दो बीज रखकर बीज मिट्टी से ढक देते है इस तरह बुवाई की जाती है .
  • या एक कुदाली से 1 से 1.5 इंच गहराई की 8 इंच की दूरी पर एक नाली बनाते है अब 8 इंच की दूरी पर 2 बीज रखकर, बीजो को मिट्टी से ढक देते है. इस तरह पौधे से पौधे व लाइन से लाइन के बीच की दूरी 8 इंच रहती है.
  • पहली सिंचाई थोडा जल्दी करे अन्य क्रियाये सामान्य गेहू उत्पादन जैसी ही रहती है.
  • और अधिक जानकारी के लिए यूट्यूब या गूगल पर खोजे.
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  • धन्यवाद

 

टॉप प्रॉफिट देने कृषि व्यवसाय

Top Profitable Agriculture Businesses

हम यहाँ किसान भाइयों के लिए कुछ कृषि व्यवसाय के बारे में बताना चाहते है, जिनको वो लोग अपने फार्म या घर पर ही स्थापित कर सकते है और खेती से और अच्छा पैसा कम सकते है, क्योकि जो कच्चा माल/सामान लगता है वो किसान के पास आसानी से उपलब्ध रहता है, बस किसान को उस व्यवसाय की पूरी जानकारी व उसकी उन्होंने कही ट्रेनिंग ली हो. यह बिज़नेस करना बहुत ही आसान है.

  1. मोती उत्पादन

  • लागत कम से मध्यम.
  • बचत बहुत ही ज्यादा होती है.
  • लेकिन इसमें किसान को प्रशिक्षण की आवश्यकता की होती है.
  • कम जगह की आवश्यकता.
  • छोटे पैमाने पर इसकी लागत लगभग 15-20 हजार तक आती है, और लाभ लगभग हर साल 1-1.5 लाख तक होता है.

2.मशरूम की खेती

  • लागत कम आती है व किसान इसको अपने घर पर आसानी से कर सकते है.
  • चूकि एक बार इसमें उत्पादन शुरू हो जाता है जो तो प्रतिदिन खपत होती है व किसान को लगातार आय मिलना शुरू हो जाता है.
  • पैदा किये गए मशरूम को फ्रेश व सुखाकर व पैक करके दूर स्थानों तक भेजकर लाभ कमा सकते है.
  • इसमें प्रशिक्षण की आवश्यकता. जो 5-10 दिन का रहता है.
  • कम जगह की जरूरत.
  • 3. ब्रोयलर मुर्गी पालन

  • इसमें मांस के लिए मुर्गी पाली जाती है,
  • इसमें मुर्गी के बच्चे लाकर पालने पड़ते है, उनकी उचित देखभाल करने के बाद जब वो पर्याप्त वजन के हो जाते है तो उनकों बाजार या होटलों में बेच दिया जाता है.
  • लागत मध्यम आती है
  • प्रतिदिन बिक्री होती है, इसमें बच्चे से बड़े का रोटेशन बनाना पड़ता है.
  • जगह की कम आवश्यकता होती है.
  • कुछ जगहों पर कुछ बड़ी बड़ी कंपनी किसानो को बच्चे उपलब्ध कराती तथा उनकी देखभाल के लिए डॉक्टर या कंपनी  का कर्मचारी भेजती है ये देखने के लिए की सबकुछ ठीक है. व मुर्गी का दाना भी उपलब्ध कराती है.
  • किसान को केवल शेड बनाना है व उनकी रोजाना देखभाल करनी है.
  • बाद में कंपनी ही उनसे मुर्गा बड़ा होने पर खरीद भी लेती है.
  1. लेयर मुर्गी पालन (अंडा उत्पादन)

  • इसमें मुर्गिया पालकर अंडो का उत्पादन किया जाता है.
  • लागत मध्यम लगाती है .
  • चूकि प्रतिदन खपत व बिक्री होती है अत किसान को लगातार इनकम होती रहती है.
  • जगह की कम आवश्यकता.
  • अधिक देखभाल की आवश्यकता
  1. मुर्गी हेचरी

  • इसमें मुर्गिया रखकर उनसे जो बच्चे पैदा होते हो उनको उन लोगो को बेचा जाता है जो मास व अंडे आदि के लिए मुर्गी पालन करते है.
  • मुर्गी के बच्चे बेचने का व्यवसाय.
  • लागत कम.
  • बचत अच्छी.
  • विशिष्ट तकनीकि की जानकारी होनी चाहिए.
  • कम जगह की आवश्यकता व अधिक देखभाल की आवश्यकता.
  1. मछली पालन

  • लागत मध्यम.
  • उत्पादन व् बचत अच्छी.
  • लोकल बाजार उपलब्ध आसानी से.
  • कम जगह की आवश्यकता
  1. सब्जी उत्पादन

  • संकर सब्जी उगाने पर उत्पादन अच्छा आता है.
  • हमेशा अच्छी, ब्रांडेड कंपनी के ही बीजों का इस्तेमाल करना चाहिए,
  • अधिक भाव वाली सब्जी उगाये.
  • चूकिं रोजाना खपत होती है इसलिए सब्जिओ को रोटेशन में लगाये.
  • हर 7-15 दिन में बेचने वाली व् एक ही वार में पकने वाली सब्जी का बरावर अनुपात रखे.

 

  • 8. नर्सरी

  • सब्जी की पौध.
  • फलो की पौध.
  • शोभाकारी पौधों की पौध.
  • जगह कम की आवश्यकता.
  • मध्यम लागत.
  • मुनाफा बहुत अधिक.
  • लम्बी अवधि तक चलने वाला व्यवसाय.
  • तैयार पौध को कही भी बेच सकते है. एक बार लोगो को पता चल जाये तो लोग एडवांस पैसा देकर भी अपने लिए पौध तैयार करवाते है.
  1. फलो का बगीचा

  • लागत मध्यम से उच्च.
  • लागत शुरू में ही ज्यादा लगती.
  • एक बार पेड़ो में फल आना शुरू हो जाये तो लगातार 15-25 साल तक फल देते है.
  • एक निश्चित समय के बाद बहुत ही अच्छी आमदनी होती है.
  • बाद में न्यूनतम लागत मुनाफा अधिक.

 

 

  • 10.  दुकान का संचालन

  • सभी किसानो को कृषि आदान- खाद, बीज, दवाई की जरूरत होती है अत कोई भी किसान इनकी दुकान खोल सकता है एव अपने गाँव या नजदीकि के गाँव में बेचकर मुनाफा कमा सकता है.
  • प्रतिस्पर्धा अधिक.
  • लागत मध्यम.
  • मुनाफा मध्यम.

11 .बीज उत्पादक कंपनी

  • लागत मध्यम से अधिक.
  • किसानो के साथ सम्बन्ध व सम्पर्क होना आवश्यक ताकि पर्याप्त मात्रा में बीज उत्पादन किया जा सके.
  • मुनाफा बहुत अधिक.
  • बीज प्रमाणीकरण की पूरी जानकारी होनी चाहिए.
  • प्रमाणित बीजो- गेहू, चना, सोयाबीन आदि के बीजो का उत्पादन किसान आसानी से कर सकते है.
  • आजकल हर जिले में बीज प्रमाणीकरण अधिकारी रहता है जिसकी मदद से आसानी से बीज उत्पादन किया जा सकता है.
  1. हाई-टेक डेयरी

  • लागत माध्यम से अधिक.
  • प्रशिक्षण की आवश्यकता.
  • मुनाफा अधिक.
  • लोकल बाजार आसानी से उपलब्ध.
  • चूकि दूध की रोजाना खपत होती है अत यह व्यवसाय कभी भी कही भी चलने वाला व्यवसाय है.
  • डेरी व्यवसाय में गाय व भेंस का उचित अनुपात रखना चाहिए.
  • चारे की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए.
  1. पाली हाउस

  • इसमें किसान सब्जी, खीरा आदि लगा सकते है.
  • इसमें उत्पादन खुले खेत की तुलना में कई गुना ज्यादा आता है.
  •  फसल में रोग व कीड़ो का नुकसान बहुत ही कम होता है.
  • शुरूआत में लागत अधिक लगती है.
  • मुनाफा ज्यादा.
  • निर्माण पर अनुदान/छूट भी मिल जाएगी.
  • उचित देखरेख की आवश्यकता.
  • सिंचाई के पानी का स्रोत होने आवश्यक है जिसमे पुरे साल भर पानी रहता हो.
  • 14. वर्मी कम्पोस्ट-

  • इसमें किसानों को केंचुआ पालन कर केचुआ खाद या वर्मी कम्पोस्ट बनाना रहता है.
  • शुरूआत में वर्मी पिट बनाने के लिए लागत आयेंगी.
  • इन पिट में खाद बनाकर किसान अपने नजदीकि के किसान या शहर में गमले में पौधे लगाने वाले, या पाली हाउस वालो को बेच सकते है.
  • एक बार पिट में केंचुए पालने के बाद केचुओ के संख्या बहुत बाद जाती है तो किसान केंचुओ के भी बेच सकते है.
  • केंचुए 300-500 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकते है.
  • तथा केंचुए की खाद 5-15 रुपये किलो के भाव से बिकती है.

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धन्यवाद.

 

 

 

 

Organic Compost

Organic Compost-

  • Compost is fully rotten organic manure of animal dung, plant residues and soil. To prepare compost a mixture of dung, plant/crop residues and soil is prepared then it is spread in layers in a compost pit.
  • Compost Pit– to prepare compost a pit has to be made with brick, sand and cement. The size of the pit remains 12*5*3 feet. In this the length is 12 feet, width is 5 feet and height is 3 feet. In this pit some rectangle shape holes are made for aeration. And the floor of pit also made cemented.
  • Filling of Compost Pit – First Round. 1. First spread a layer of 15 cm of animal dung, crop residues and other material which comes from home and from the animal sitting floor.
  • 2. Second layer is made of soil. In this the 5 cm of soil layer is spread over the layer of dung.
  • 3. Now spray mixture of water and animal dung over the layer of soil.
  • 4. Second Round- Repeat the above given method. Spread layer of dung, layer of soil and spray of mixture of water and dung.
  • This procedure of layering is followed till the layers reach at 2-3 feet of height from the edge of the pit.
  • When it fills above the edge now make a layer of dung and water above the heap.
  • Leave this compost pit for 15 days than the weed grow and becomes destroy.  After 15 days make some hole in the dung heap and leave it for 3 month. After 3-4 month the compost will be ready to use. Now it can be used for cultivation of crops. It can be used in any crop.
  • Precaution in composting
  • Some water should be mixed with the dung mixture so that moisture can be maintained in pit.
  • The stone and polythene should be removed from the dung of crop residues.
  • Some water should be sprayed over the heap after some interval.
  • preparation of this compost is very easy with no cost. only  one time expenses is to be done to making pit.
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  • Thanks.