पशुओ के रोग एवं उपचार

पशुओ के सामान्य रोग, लक्षण एवं प्राथमिक उपचार –
  • 1. रोग – मुह पकाना व छाले पड़ना
  • कारण – कोई बीमारी, कांटे लगना एवं दांत ख़राब होना.
  • लक्षण – चारा कम खाना व चारा खाना बंद करना, लार टपकना, मुह बा जीभ में छले पड़ना, बदबू आना बा जीभ बाहर आना आदि.
  • प्राथमिक उपचार – लाल पोटाश के 1% घोल से अच्छी तरह से पूरा मुह 2-3 बार धोना व ग्लिसरीन मुह में लगाना.
  • 2. पेट फूलना या अफरा
  • कारण – चारे में परिवर्तन व असंतुलित आहार, बासी खुराक, सूखे चारे के बाद हरा चारा अधिक मात्रा में खिलाना.
  • लक्षण- पशु के बाई तरफ का पेट अधिक फूलना, ढोलक जैसी आवाज आना, पशु का बार-बार उठना बैठना, लार टपकना, मुह से साँस लेना, जीभ बाहर निकालना, पेट दर्द व कराहना.
  • प्राथमिक उपचार- पशु को बैठने नहीं देना व दवाई धीरे-धीरे पिलाना.
  • तारपीन का तेल 30-50 ग्राम पिलाना.
  • मीठा तेल 500 ग्राम पिलाना.
  • हींग 10-15 ग्राम या टिपोल तेल 50 ग्राम पानी के साथ पिलाये.
  • 3.  कब्ज या पेट में गांठ पड़ जाना
  • कारण – ज्यादा सूखा चारा खाना, कम पानी पीना, गला-सडा चारा खाना.
  • लक्षण- पशु सुस्त होना, जुगाली करना बंद करना, बाई तरफ पेट फूलना व सख्त होना, गोबर कम करना या बंद होना, गोबर सख्त व सूखा होना और पेट दर्द होना.
  • प्राथमिक उपचार- 1. मैग्नेशियम सल्फेट 100-250 ग्राम, सादा नमक 100 ग्राम, गुड 250 ग्राम, 1 या 1.5 लीटर गर्म पानी के साथ देना.
  • मैग्नेशियम सल्फेट के साथ 50-100 ग्राम हिमालय बत्तीसा देना.
4. पेट में कीड़े पड़ना
  • कारण- आसपास के वातावरण में कीड़ो के अंडो के माध्यम से गन्दगी और बीमार पशु के गोबर से, अस्वच्छ पानी आदि के द्धारा.
  • लक्षण- पशु सुस्त व शक्तिहीन, गोबर पतला करना, गोबर में काला खून व कीड़े दिखना, पशु में खून की कमी, पशु के चारा खाते हुए भी शरीर की वृद्धि कम व पेट का बढ़ जाना.
  • प्राथमिक उपचार- 1. एन्टीपार – (पाईपराजीन) 5-25 मिली.
  • 2. पानाक्यूर टेबलेट – छोटा पशु 0.5 ग्राम, बड़ा पशु 1.5 ग्राम/100-150 कि.ग्रा.

    5. दस्त/अतिसार
  • कारण – यह रोग कीटाणुओं द्धारा होता है, यह एक सक्रामक रोग है. मुख्य कारण अधिक मात्रा में बछड़े को दूध पिलाने व बछड़े को गंदे व आद्र व बंद कमरे में रखने से होता है, खली न खिलाने आदि.
  • लक्षण- सफ़ेद, पतले दस्त के साथ बदबू, बछड़े का धीरे-धीरे कमजोर होना व रोग प्रचंड रूप में होने पर बछड़े का मर जाना.
  • प्राथमिक उपचार – 5 ग्राम टेबलेट स्ट्रीनासीन टेरामाईसिन या ट्रामेघप्रिम सल्पा देना चाहिए.
  • छाछ या चावल मांड को 25-50 ग्राम नेबलेन पावडर के साथ 3 बार देना चाहिए.
  • 6. मोच, सूजन, लड़खड़ाना, हड्डी का उतर जाना
  •  कारण- जानवर के फिसलने, ऊँची-नीची  जगह चलने, अधिक सामान खीचने से होता है.
  • लक्षण- शरीर के जोड़ो और मांसपेशियो स्नायु व नस में चोट के कारण लंगड़ापन और दर्द होना, सूजन आना, पशु का एक स्थान पर पड़े रहना और उठना नहीं आदि.
  • प्राथमिक उपचार- पहले वर्फ से सिकाई, 2-4 दिन होने पर नमक के गर्म पानी से सिकाई, साथ में लिनिमेह या आयोडेक्स से मालिश करके पशु को चलाना.
  • 7. सींग टूटना
  • कारण- आपस में पशुओ के लड़ने से, लाठी लगने, टक्कर लगने आदि से सींग टूट जाता है.
  • लक्षण- सींग से खून निकलना, सींग टूटना, सींग का खोल उतर जाना.
  • प्राथमिक उपचार- अगर खोल निकलता है व खून बह रहा है तो टिबेनजाइन लगाकर कस के पट्टी बांधे, टूटे सींग पर टिबेनजाइन का फाया रखकर खून बंद करे और पट्टी बांधे.
  • 8. दाद – खुजली
  • कारण- चर्म रोग, छूत से एक पशु से दुसरे को होता है.
  • लक्षण- पशु को खुजली होती है तो शरीर पर छोटे-छोटे गोल आकार के जख्म हो जाते है चमड़ी लाल हो जाती है.
  • प्राथमिक उपचार- लाल पोटाश के घोल से साफ कर गंधक का मलहम लगाये, पशु को अलग रखे.
  • थनों का फटना-
  • कारण – सर्दी के मौसम में अधिक होता है, बछड़े की लार से पशु के थन की चमड़ी का खुश्क होना, चमड़ी का फटना, दांतों से खरोच आना.
  • लक्षण- थन की चमड़ी फट जाती है, खून निकलना, थनों में सूजन व दर्द होना आदि.
  • प्राथमिक उपचार – हल्के गर्म पानी में 1% पोटाश के घोल से साफ कर दूध निकालने के बाद मलहम लगाना चाहिए और चमड़ी न सूखे इसके लिए ग्लिसरीन थनों में लगानी चाहिए.
  • 9. जू –
  • कारण- पशुओ के आपस में संपर्क में आने से, पशुओ के शेड में उपस्थित जू से, चारागाह आदि से.
  • लक्षण- पशुओ के शरीर के निचले भाग में, पूँछ व पैरो के बीच, बालों में जू खुजली करती है.
  • प्राथमिक उपचार – 250 ग्राम नीम की पत्ती व तम्बाकू की पत्ती को दो लीटर पानी में उबालकर 10 लीटर ठन्डे पानी में मिलाकर शरीर को साफ करे.
  • 10. जहरवाद/थनैला-
  • कारण – पूरा दूध थन से न निकलना, गन्दी जगह पर पशुओ जा बैठना, मिलकर द्धारा व बछड़े के दांत आदि से.
  • लक्षण – थन में सूजन, थन का फटना, थथोले पड़ना, खून व पीप निकलना आदि.
  • प्राथमिक उपचार- अधिक सूजन होने पर ठंडी बर्फ से सिकाई, दूध तुरंत खाली कर थनों में मलहम डालकर, पशु चिकित्सक को दिखाए.
  • उपचार करने से पूर्व पशु चिकित्सक से संपर्क जरूर करे.
  • धन्यवाद

Thanks.

Please visit our You Tube channel —Digital Kheti —-

 

  • photo from- pexels

हरी खाद

Green Manure-

  • अविच्छेदित अर्थात बिना सड़े-गले दलहनी व अदलहनी हरे पौधे या उनके भागों (तना, पत्ती आदि) को जब मृदा की नत्रजन या जीवांश की मात्रा बढाने के लिए खेत में दबाया जाता है, तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते है.
  • एक बार सनई की हरी खाद देने से लगभग प्रति हेक्टर 75 क्विंटल जैव पदार्थ एवं 84 किलोग्राम नत्रजन फसल को मिलता है. सामान्यतया हरी खाद में 0.5 -1% तक नत्रजन, 0.1 -0.2% तक फोस्फोरस तथा 0.8-1% तक पोटाश की मात्रा होती है.
  • फसल का नाम – सनई
  • बुवाई का समय – अप्रैल से जुलाई
  • बीज दर – 80-100 किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 20-25 टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.75 %
  • फोस्फोरस – 0.12 %
  • पोटाश – 0.51%
  • फसल का नाम – ड़ेंचा (सेस्बानिया रोसट्रेटा )
  • बुवाई का समय – अप्रैल से जुलाई
  • बीज दर – 80-100 किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 20-25 टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.62  %
  • फसल का नाम – लोबिया
  • बुवाई का समय – अप्रैल से जुलाई
  • बीज दर – 40-50  किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 15-20  टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.71 %
  • फोस्फोरस – 0.15 %
  • पोटाश – 0.50%
  • फसल का नाम – उड़द
  • बुवाई का समय – जून  से जुलाई
  • बीज दर – 20-22  किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 10 -12  टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.85 %
  • फोस्फोरस – 0.18  %
  • पोटाश – 0.53%
  • फसल का नाम – मूंग
  • बुवाई का समय – जून  से जुलाई
  • बीज दर – 20-22  किलोग्राम/हेक्टर
  • हरे पदार्थ की मात्रा – 8-10  टन/हेक्टर
  • नत्रजन – 0.72 %
  • फोस्फोरस – 0.17 %
  • पोटाश – 0.53%
हरी खाद की विशेषताये-
  • जो फसल हरी खाद के रूप में उपयोग कर रहे है वो –
  • फसल कम समय में अधिक वृद्धि करने वाली होनी चाहिए.
  • फसल की जड़ मृदा में अधिक गहराई तक जाती हो.
  • फसल की वानस्पतिक वृद्धि –तने शाखा व पत्तियाँ अधिक लगती हो.
  • फसल के वानस्पतिक अंग मुलायम हो.
  • फसल की जल मांग कम हो.
  • फसल को कम मात्रा में पोषक तत्वों की जरूरत हो.
  • विषम परिस्थितियों में भी हरी खाद वाली फसल अच्छी बडवार करे.
  • फसल में कीड़े व रोग कम लगते हो.
  • भूमि को अधिक मात्रा में जीवांश पदार्थ प्रदान करती हो.
  • फसल का बीज सस्ता होना चाहिए.
  • हरी खाद देने की विधियाँ- 1. सीटू विधि – इस विधि में जिस खेत में हरी खाद उगाई जाती है उसी खेत में उसको दबा दिया जाता है. यह विधि उन क्षेत्रो में अपनायी जाती है जहा बारिश अच्छी होती है.
  • हरी पत्तियो द्धारा- इस विधि में फसल को खेत में उगाते है वो उसको काटकर अन्य दुसरे खेत में दबाते है. यह विधि उन क्षेत्रो में अपनायी जाती है जहा नमी कम होती है.
  • हरी खाद के लिए उपयुक्त फसल-
  • दलहन फसले- मुख्य फसले- सनई , ड़ेंचा .अन्य फसले-मेंथी, मसूर,खेसारी, सेंजी, मटर, बरसीम आदि.
  • अदलहनी फसले- जई, जौ, राई, सरसों शलजम आदि हरी खाद के रूप में उपयोग की जाती है.
  • हरी खाद की पलटाई का समय – जब फसल परिपक्व न हुई हो तथा फसल में फूल निकलना प्रारंभ हो गए हो तब पलटाई की जाती है इस समय फसल मुलायम रहती है खेत में जल्दी सड जाती है.
  • सनई की फसल बुवाई के 50 दिन बाद व ड़ेंचा 45 दिन बाद खेत में पलटने के लिए तैयार हो जाता है.
  • पलटने की विधि- खेत में मिट्टी पलटने वाला हल चलाकर पाटा चलाकर अच्छी तरह दबा देना चाहिए.
  • अगली फसल की बुवाई का समय- हरी खाद को पलटने के 30-40 दिन बाद अगली फसल बोनी चाहिए.
  • हरी खाद के लाभ – मृदा में जैविक पदार्थ व नत्रजन की मात्रा बढाता है.
  • मृदा में पोषक तत्वों का सरक्षण करता है.
  • पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि करता है.
  • मृदा सतह का सरंक्षण करता है.
  • खरपतवार का नियंत्रण करता है.
  • लवणीय व क्षारीय भूमियो में सुधार करता है.
  • फसल संरचना व फसल उत्पादन में वृद्धि करता है.
  • लागत कम लगती है.

धन्यवाद- Thanks

फसलों व सब्जियों में कीट नियंत्रण

  • INSECT CONTROL IN CROPS & VEGETABLES, 
  • कीड़े फसलों में पत्ती, तना आदि से रस चूस कर, पत्तियो को खाकर, तने में छेद करके, फसल को पत्ती रहित करके,पेड़ो/फसलों के फूलों को गिरा के, आदि से नुकसान पहुचाते है.
  • सबसे ज्यादा फसल में कीडों की लार्वा अवस्था नुकसान पहुचती है.
  • कीडों की जनन अवस्था- अंडे, लार्वा/इल्ली/, निम्फ, वयस्क आदि है.
  • मकड़ी व जैसिड में वयस्क अवस्था व एफिड में निम्फ अवस्था मे नुकसान पहुचाते है.
  • फसलों में कीट नियंत्रण
  • कीटनाशियो से फसल में कीडों का नियंत्रण करते है.
  • तथा एकारिसाईड/माईटीसाईंड से कीडा मकड़ी/माईट का नियंत्रण करते है
  • कार्य करने के आधार पर कीटनाशक तीन प्रकार के होते है.–
  • 1. संपर्क कीटनाशी- ये कीटनाशी कीड़े के संपर्क में आने पर कीड़े की त्वचा से ग्रहण कर लिए जाते है कीडो की श्वसन नलिका को अवरुद्ध करके कीड़े को मर देते है.
  • 2. स्टोमक/जठर कीटनाशी-ये खाने के साथ कीड़े के पेट में चले जाते है और आहार नल में जाकर कीड़े को मर देते है.
  • 3. सिस्टमिक/सर्वांगनाशी – ये पेड़/फसल दयारा सोख लिए जाते है एवं पूरे पेड़ में फ़ैल जाते है जब कीड़ा पेड़ का रस चूसता है तो कीटनाशी आहार नल में जाकर कीड़े को मर देता है.
  • 4. फूमिगेंट/गैसीय कीटनाशी- ये गैस का उत्पादन करते व गैस कीडों दयारा श्वसन नलिका से ग्रहण करने से कीड़े मर जाते है.
  • कीटनाशी –
  1. प्रोपेरागाईट (proparagite 57% EC)-
  •  यह विभिन्न फसलों/सब्जियों में मकड़ी/माईट को मारता है
  • मात्रा – 300-500 मिलीलीटर /एकड़.
  • यह बाजार में ओमाईट आदि नाम से बाजार में मिलता है.
  1. मिथोमिल (Methomyl 40% SP) –
  •  यह विभिन्न फसलों/सब्जियों में पत्ती खाने वाले, फल भेदक, आदि कीडों के लार्वा को मारता है.
  • यह संपर्क, जठरीय व गैसीय विधि से कीडों का नियंत्रण करता है.
  •  मात्रा – 300-400 ग्राम/एकड़.
  • यह बाजार में डूनेट आदि नाम से बाजार में मिलता है.
  • 3. बाईफेन्थ्रिन( बिफेन्थ्रिन 10% EC)-

  •  यह फसलों व सब्जियों में संपर्क व जठरीय विधि से  कीडों के लार्वा, व्हाइटफ्लाई, मकड़ी, जैसिड आदि को मारता है.
  • तथा यह गेहू में दीमक को संपर्क, जठरीय व प्रतिकार्षी (reppelent) विधि से नियंत्रण करता है.
  • दीमक के नियंत्रण के लिए 400 मिली. बाईफेन्थ्रिन को 20-25 किलों रेत/मिटटी में मिलाकर एक एकड़ में फेककर सिचाई कर दे.
  • मात्रा- 200-400 मिली/एकड़
  • यह बाजार में “मार्कर” आदि नाम से बाजार में मिलता है.
  1. कार्बोसुल्फान (Carbosulfan 25% EC)-
  •  यह फसलों/सब्जियों में तना/फल भेदक व जैसिड कीडों को संपर्क व जठर विधि से नियंत्रण करता है.
  • मात्रा – 300-400 मिली/एकड़.
  •  यह बाजार में “आतंक” आदि नामो से बाजार में मिलता है.
  1. इमामेक्टिन बेन्जोएट (Emamectin Benzoate 5% SG)-
  • यह विभिन्न फसलों/सब्जियों में कीडों के लार्वा को मारता है.
  • यह transleminar system ट्रांसलेमिनार सिस्टम यानि पत्तियो के आरपार जाकर पत्ती के नीचे वाले भाग में लगे कीडों को मारता है.
  •  मात्रा 100 ग्राम/एकड़.
  1. एसीटामीप्रीड- (Acetamiprid 20% SP)-
  • यह एक सर्वांग कीटनाशी है जो फसलों /सब्जियों में व्हाइटफ्लाई व रस चूसने वाले कीडों (जैसिड, एफिड, थ्रिप्स आदि) को मारता है.
  • यह किसान के लिए लाभदायक कीडों(मित्र कीट) को नहीं मारता है.
  •   यह बाजार में “धनप्रीत” आदि नाम से मिलता है.
  • मात्रा 60-100 ग्राम/एकड़.
  1. थिआमेथाक्जाम (Thiamethoxam 25% WG)-
  • यह विभिन्न फसलों/सब्जियों में जैसिड, एफिड, व्हाइटफ्लाई, थ्रिप्स लार्वा आदि कीडों को मारता है.
  •  यह कीटनाशी पूरे पेड़ में फ़ैल जाया है व पत्ती के आरपार जाकर छुपे हुए कीडों को भी मार देता है.
  •  मात्रा – 40 ग्राम/एकड़.
  •  यह बाजार में “एरेवा” आदि नाम से मिलता है.
  • 8. इथोफेनप्रोक्स (Ethofenprox 10% EC)-
  •  ये विभिन्न फसलों/सब्जियों में तना छेदक , पत्ती मोडने वाले, कीडों के लार्वा, जैसिड, एफिड, व्हाइटफ्लाई, आदि कीडों को मारता है.
  • यह लार्वा आदि के अलावा कीडों के अंडे को भी नष्ट करता है.
  •  मात्रा – 400 मिली/एकड़.
  •   यह बाजार में “बोम्बार्ड” आदि नाम से मिलता है.
  •  9.  इमिडाक्लोप्रीड Imidacloprid 17.8% SL-
  • एवं यह एक सर्वांगी कीटनाशी है, ये रस चूसने वाले कीडों का नियंत्रण करते है.
  • यह गन्ने में दीमक का नियंत्रण का भी करते है.
  •  मात्रा – 100 मिली/एकड़.
  •  यह बाजार में “मीडिया” आदि नामो से मिलता है.
  1. इमिडाक्लोप्रीड Imidacloprid 70% WG.-
  •  बीज उपचार में उपयोग करते है.
  •  रस चूसक कीडों का नियंत्रण करते है.
  • मात्रा- 12-14 ग्राम/एकड़.
  • यह बाजार में “एड-फायर” आदि नामो से मिलता है.
  1. स्पिनोसेड ( Spinosad 45% EC)-
  •  यह एक प्राकृतिक उत्पाद है.
  • यह विभिन्न फसलों/सब्जियों आदि में केटरपिलर/लार्वा आदि को नियंत्रण करता है.
  •  मात्रा- 50-75 मिली/एकड़.
  •   ये बाजार में “वनअप” आदि नामो से मिलता है.
  1. बुप्रोफेजिन Buprofezin 25% EC-
  • यह फसल/सब्जियों में रस चूसने वाले कीड़े, थ्रिप्स, व्हाइट फ्लाई, निम्फ, कपास/अंगूर में मिलीबग आदि का नियंत्रण करता है.
  • यह निम्फ में शरीर का कंकाल बनाने से रोकता है जिससे निम्फ विकसित नहीं होता व कीड़ा मर जाता है.
  • यह कीडों में मादा की अंडे देने की छमता को कम कर देता है.
  • मात्रा – ३३० मिली/एकड़.
  • यह बाजार में “एप्पल” आदि नामो से बाजार में मिलता है.
  • सावधानिया-
  • फसल में कीडों के अनुसार कीटनाशी का चुनाव करे.
  • सही मात्रा का उपयोग करे.
  • फसल में उपयोग करने से पूर्व कीटनाशी के साथ दिए गए पत्र में निर्देशों को जरूर पड़े.
  • उपयोग करने से पूर्व वैज्ञानिक सलाह जरूर ले.
  •  स्प्रे करते समय कुछ खाए ना  या धूम्रपान न करे.
  • खाली पेट स्प्रे न करे. स्प्रे करने से पूर्व कुछ खा ले.

धन्यवाद.

 

 

Source for Organic Farming.

ORGANIC FARMING

Methods of Making Organic Manure-

  • Bio gas/Gobar Gas-It is made of 2, 3 and 5 cube meters. And mostly for a single farmer 2 cube meter size Gobar Gas is sufficient. In this gobar/dung of animal is mixed in water and pour in the Gobar Gas drum and slurry and gas is produced. Slurry is used for crop growing and gas is used for cooking. In some state in this subsidy is also being provided by the agriculture department for the construction of Gobar-Gas.
  • NADEP TANKA- In this 3*5*12 feet size of tanka is made. 3 feet height, 5 feet width and 12 feet long of brick and cement or mud tanka. This tanka should have hole in the walls for aeration. In this crop residue, dung and waste of home and animal feed is spread layer by layer and after 3-4 month, the manure becomes ready to use.
  • Vermi-Compost- In this old and semi rotten dung, crop residues are spread in tanka and earthworms are leaved in the pit. These earthworms feed on these and convert it in manure in 45 days. In VermiCompost moisture should be maintained and the pit should be covered by the shade or roof.
  • GREEN MANURE- In this Dencha, Sanai, Gwar and Lobea etc may be used for green manuring. In this these crops are grown and after 45 days or before the crop has started flowering these should be mixed in the soil by the plough and then the main crops should be grown.
  • CULTURES – In this many culture are used crop wise.
  • Rhizobium culture- this is used in leguminous crops- soybean, urd, moong etc.
  • Azospirillium- his is used and wheat or cereals crops.
  • Azotobactor culture- this is used and wheat or cereals crops.
  • This culture mixed with the seed of crops then sowing is done with treated seed. These cultures make the environmental nitrogen available to the leguminous crops.
  • PSB culture – this culture makes soil Phosphorus available to the plant and may be used in any crops.
  • MATKA KHAD- In this a mud pot is taken in this 15 kg. Cow/buffallow dung and 2 liters cow urine, 1 kg. field soil and 1000 gm. gud ( jaggery) and 1 kg flour of pulses or gram are taken and one by one all given above should be well dissolved in water, then poured in the matka. After this the mud pot mouth should be tied well with the cloth and keep this in the shade for 14-15 days out the of the reach of children. After fifteen days filter it by the help of cloth and then spray over the crops.   Dissolved this solution in 200 liter water and spray it in one acre. Spray may be repeated after 15 days. In one season crops spray is done for 3-4 times and in long duration crops 8-9 spray should be done.
  • HOME BASED ORGANIC INSECTICIDES
  • Crushed 5 kg. Neem leaves, crushed nimboli (neem Seed) 1 kg and cow urine 10 liter. Keep these items in a cupper pot for 10 days
  • Or boil this item in 10 kg water. The boiling should be done up to the water remains half the previous quantity. Filter this and make solution of 200 liter and spray in one acre. It will control the pest of the crops.
  • Take 1 kg. Green chili and 500 gm Garlic and crushed them we well separately after that filter this crushed paste in 20 liter water and mix this in 200 lt water and spray this solution in the field.
  • Sources of Organic Fertilizer and Organic Pesticides
  • Dung & urine of cow, buffallowes, goat, sheep etc.
  • Residue of crops.
  • Green manure- Dencha (Sesbania rostrata), gwar and lobea etc.
  • Leguminous crops- soybean, urd, moong, pigeon pea (arhar), groundnut etc,
  • Cultures- Rhizobium, PSB, Azotobacter culture etc.
  • BGA –for cultivation of Paddy.
  • Bone Meal
  • Vermi-Compost and Vermi-Culture.
  • Neem cake, and others cakes
  • Neem oil.
  • Bariyana basiyana- pest control
  • NPV- used in Gram to pest control
  • Trichoderma viridae to control diseases.

THANKS

 

 

नेसनल मिशन फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर

National Mission for Sustainable Agriculture (NMSA)

  • यह योजना वर्षा आधारित क्षेत्र में कृषि की उत्पादकता को बढाने के लिए बनाई गई है. यह योजना मुख्यतः समग्र खेती, जल प्रयोग क्षमता, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एव साधन (जल व मृदा) सरंक्षण पर केन्द्रित रहेगी.
  • नमसा योजना के मुख्य बिंदु जल उपयोग क्षमता, पोषण प्रबंधन व जीविका उपार्जन विविधता है.

मिशन में उद्येश्य –

  • कृषि को अधिक उत्पादन व टिकाऊ खेती पर जोर देना है.
  • प्राकृतिक स्रोत जल व मृदा का सरक्षण करना.
  • मृदा उवर्कता मैप (नक्शा) के आधार पर मृदा के स्वास्थ्य का प्रबंधन और मृदा परीक्षण के आधार पर पोषक तत्वों के प्रयोग को बढावा देना है .
  • जल स्रोतों का विवेकपूर्ण उपयोग करना.
  • कृषक की क्षमता को बढाना.
  • यह पायलट आधार पर बने गयी योजना जो वर्षा आधारित (सूखा) क्षेत्रो में कम करेगी.

इस योजना के अंतर्गत के मुख्य चार घटक है

  •  रेनफेड वर्षा आधारित क्षेत्रो का विकास
  • खेत पर जल प्रबंधन
  •  मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन
  •  जलवायवीय परिवर्तन एवं टिकाऊ खेती की मोनिटरिंग. मॉडलिंग एव नेटवर्क स्थापित करना.
  • इस योजना के अंतर्गत लागत निर्देश व सहायता/अनुदान प्रक्रिया
  •    घटक – समग्र खेती सिस्टम ( इंटीग्रीटेड फार्मिंग सिस्टम)
  • क्रोपिंग सिस्टम –
  • धान-1.गेहू आधारित – आदान लागत का  50 % अनुदान
  • मोटे खाधान्य आधारित- आदान लागत का  50 % अनुदान
  • तेलीय फसल आधारित- आदान लागत का  50 % अनुदान
  • रेशे फसल  आधरित-आदान लागत का  50 % अनुदान 
  • वानिकी व फसल आधारित- आदान लागत का 50 % अनुदानउधानिकी आधारित फार्मिंग सिस्टम-आदान लागत का 50 % अनुदान
  • पशुपालन आधारित- आदान लागत का 50 % अनुदान
  • मछली पालन आधारित फार्मिंग सिस्टम- आदान लागत का 50 % अनुदान
  • मधुमक्खी पालन- 50% लागत का  अनुदान   (सीमा   20000 रुपये प्रति हितग्राही)
  • साईलेज का निर्माण-( हरे चारे सरंक्षित करने के लिए )-  100 % अनुदान सीमा 1.25 लाख रुपये/हितग्राही
  • ग्रीन हाउस/पाली हाउस- लागत का 50% अनुदान ( सीमा 10 लाख/हितग्राही)
  • वाटर हार्वेस्टिंग /मैनेजमेंट- व्यक्तिगत- अनुदान 50 % लागत का ( सीमा 75-90 हजार)
  • वाटर हार्वेस्टिंग एवं प्रबंधन- समुदाय/पुरे गाँव के लिए- 100 %  अनुदान( सीमा 20-25 लाख )
  • ट्यूब वेल व बोर वेल का निर्माण- लागत का 50 % अनुदान (सीमा 25 हजार/हितग्राही)
  • वर्मी कम्पोस्ट यूनिट का निर्माण- लागत का 50 % अनुदान( सीमा 50 हजार/ हितग्राही )

मूल्य संवर्धित एवं प्रक्षेत्र विकास क्रियाये-

  • पोस्ट हार्वेस्ट/ भण्डारण- गाँव स्तर पर भण्डारण /पैकिंग/प्रोसेसिंग यूनिट- लागत का 50 % अनुदान ( सीमा 2 लाख/हितग्राही.
  • किसान उत्पादक कंपनी का निर्माण- प्रोजेक्ट लागत का 2 % अनुदान.
  • माइक्रो इरीगेशन-  ड्रिप/स्प्रिंकलर- लागत  का 25-35%. अनुदान
  • यांत्रिक फल/सब्जी के व्यर्थ बचे भाग से कम्पोस्ट उत्पादन यूनिट-  100% का अनुदान सरकारी एजेंसी/संस्थानो के लिए (सीमा 190 लाख) . प्राइवेट संस्थानो के लिए लागत का 33% अनुदान ( सीमा 63 लाख/यूनिट).
  • तरल/वाहक आधारित बायो फर्टिलाइजर/बायो पेस्टिसाइड के उत्पादन की यूनिट-  100% का अनुदान सरकारी एजेंसी/संस्थानो के लिए (सीमा 160 लाख). व्यक्तिगत/प्राइवेट संस्थानो के लिए लागत का 25% अनुदान ( सीमा 40 लाख/यूनिट)
  • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन
  • मृदा परीक्षण को मजबूत करना.
  • इसमें सरकारी संस्थानो के लिए.नई/वर्तमान प्रयोगशाला/चालित प्रयोगशाला स्थापित करने  के लिए लागत का 75% का अनुदान रहता है एवं इसकी लिमिट 56 लाख रहती यदि कोई प्राइवेट संस्थान मृदा परिक्षण प्रयोगशाला बनाना चाहता है तो प्रदेश सरकार को प्रोजेक्ट बनाकर भेज सकते है.
  • ज्यादा जानकारी के लिए अपने जिले के कृषि विभाग में संपर्क करे.
  • कृषि की योजनओं आदि के लिए गूगल या यूट्यूब पर हमारे चैनल –Digital Kheti —को खोजे सर्च करे

Thanks.

National Mission for Sustainable Agriculture (NMSA)

  • This scheme has been formulated for enhancing agricultural productivity especially in rainfed areas focusing on integrated farming, water use efficiency, soil health management and synergizing resource conservation.
  • NMSA will cater to key dimensions of ‘Water use efficiency’, ‘Nutrient Management’ and ‘Livelihood diversification’

Mission Objectives

  • To make agriculture more productive and sustainable
  • To conserve natural resources soil and Water
  • To adopt comprehensive soil health management practices based on soil fertility maps, soil test based application of macro & micro nutrients, judicious use of fertilizers etc.
  •  To optimize utilization of water resources means

‘more crop per drop’.

  • To develop capacity of farmers
  • To pilot models in select blocks for improving productivity of rainfed farming.
  • Mission Strategy
  •  To achieve these objectives, NMSA will have following   strategy:
  •  Promoting integrated farming system covering crops, livestock & fishery, plantation and pasture based farming for enhancing livelihood opportunities, ensuring food security and minimizing risks
  •  Popularizing resource conservation technologies
  • Promoting effective management of available water resources and enhancing water use efficiency through application of technologies.
  • Encouraging improved agronomic practices for higher farm productivity, improved soil treatment, increased water holding capacity, judicious use of agriculture chemicals.
  • Creating database on soil resources through land use survey.
  • Promoting location and crop specific integrated nutrient management practices for improving soil health, enhancing crop productivity and maintaining quality of land and water resources.

NMSA has following four (4) major programme components or activities:

  • Rainfed Area Development (RAD):
  • On Farm Water Management (OFWM):
  • Soil Health Management (SHM):
  • Climate Change and Sustainable Agriculture: Monitoring, Modeling and Networking (CCSAMMN):

National Mission for Sustainable Agriculture (NMSA)

  • Cost Norms and Pattern of Assistance
  • Rainfed Area Development (RAD)
  • A (I). Sub Component: Integrated Farming System-
  • Cropping system-
  • Rice/ wheat based- 50% of input costs
  • Coarse cereal based- 50% of input costs
  • Oil-seed based- 50% of input costs
  • Fibre based- 50% of input costs
  •  Pulse based- 50% of input costs

Value addition and Farm development activities-

  • Horticulture Based farming system- 50% of input costs (Plantation +Crops/Cropping System)- 50% of input costs
  • Livestock based farming  system- 50% of input costs
  • Fishery based farming system- 50% of input costs.
  • Apiculture (Bee Keeping)- One unit per farm- 50% of input cost limited to  Rs. 20,000/- per beneficiary.
  • Silage making for increased availability of green fodder round the year- Construction of Silo Pit-  100% assistance limited to Rs. 1.25 lakh per farm family
  • Green house & Low Tunnel/poly house- High value crops,Vegetables, Flower –  50% of input cost subject to a limit of: Tubular poly house limited to Rs. 10,00,000/- per beneficiary

Water Harvesting and Management-

  • Water harvesting system for individuals-  50% of cost limited to Rs. 75000 for plain areas and Rs. 90000 for hilly areas.
  • Water harvesting system for communities:-  100% of cost limited to Rs. 20 lakh /unit in plain areas, Rs. 25 lakh/unit in hilly areas)
  • Construction of Tube wells/ Bore wells- 50 % of the total cost limited to 25000/ -per unit.
  • Micro Irrigation-Drip Irrigation /Micro Sprinkler-  35% of the total cost for small & marginal farmers and 25% of actual cost for others
  • Vermi compost Units-  Construction of Vermi compost units-  50% of cost subject to a limit of  Rs. 50,000/- per unit.
  • Post harvest & Storage-  Small village level Storage/ packaging/processing unit-  50% of capital cost subject to a limit of  Rs. 2.0 lakh per Unit.
  • Formation of Farmer Producers Organizations- Up to 2% of project cost

Soil Health Management

  • Strengthening Of Soil Testing Laboratories
  • 75% of the project cost, subject to a limit of Rs. 56 lakh, will be provided as subsidy for purchase of machinery & equipment, chemicals & glass wares, miscellaneous laboratory articles.
  • In case of Mobile STLs, financial assistance from DAC shall be 75% of the project cost subject to a maximum of Rs. 56 lakh per Mobile STL.
  • Setting up of mechanized Fruit/Vegetable market waste/ Agro waste compost production unit.-  100% Assistance to State Govt/Govt. Agencies upto a maximum limit of Rs. 190.00 lakh /unit and 33% of cost limited to Rs. 63 lakh/unit for individuals/private agencies.
  • Setting up of State of liquid/ carrier based Biofertilizers/Biopesticides units-  100% Assistance to State Govt/Govt. Agencies upto a maximum limit of Rs. 160.00 lakhs /unit and 25% of cost limited to Rs. 40 lakhs/unit for individuals/private agencies.

Please follow us-
https://www.youtube.com/digitalkheti.

Thanks-

मृदा परीक्षण किट

“ Soil Testing Kit   

मृदा परीक्षण किट

  •   आजकल आसानी से मृदा में पोषक तत्व व ई.सी., पी, एच. व कार्बनिक पदार्थ परिक्षण करने के लिए मृदा परीक्षण किट आती है.
  •  जिसकी सहायता से किसान/संस्थान/एन.जी.ओ.आदि आसानी से मृदा परिक्षण कर सकते है.
  •   एक किट के साथ आवश्यक उपकरण व रसायन रहते है.

मृदा परीक्षण किट

  •     ये किट विभिन्न कंपनियो दयारा बने जाती है.
  •      इसको कोई भी एन.जी.ओ./संस्था आसानी से प्रयोग कर सकती है.
  • छोटे पैमाने पर मिट्टी परिक्षण करने के लिए इसका उपयोग कर सकते है.
  • मृदा परीक्षण के लिए उपकरण- इस किट के साथ वह सभी  उपकरण आते है जो मृदा परिक्षण के लिए आवश्यक है
  • मृदा परिक्षण में आवश्यक रसायनों -इस किट के साथ वह सभी रसायन  आते है जो मृदा परिक्षण के लिए आवश्यक है 

मृदा परीक्षण किट की कीमत

  • मृदा परीक्षण किट की कीमत लगभग एक लाख रुपये रहती है.
  • इसमें मिटटी परिक्षण के लिए आवश्यक उपकरण रहते है.
  • तथा इसके साथ मृदा परिक्षण मैन्युअल रहता है जिसकी सहायता से मिट्टी परिक्षण कर सकते है.
  • मृदा परिक्षण में आवश्यक रसायनों की किट
  • किट के साथ मृदा परिक्षण के लिए आवश्यक रसायन आते है.
  • जिन पर बोतल नंबर लिखा रहता है.
  • मैन्युअल में बताये गए अनुसार  बोतल नंबर का रसायन मिट्टी में मिलाने व एक्सट्रेक्ट करके मिट्टी परिक्षण करते है.
  • इसकी कीमत लगभग 17  हजार रुपये रहती है.

किट से क्या परिक्षण कर सकते है

  • इस किट से मृदा की पी.एच.,
  • ई.सी. (विद्धुत चालकता),
  • कार्बनिक पदार्थ व
  • पौधे के लिए आवश्यक 16 तत्वों को मात्रा मृदा का पता कर सकते है.
  • व मिट्टी परिक्षण के परिणामो के आधार पर मृदा में उर्वरक डाल सकते है.
  • इस किट से लगभग 100 नमूने test कर सकते है.
  • और ज्यादा नमूने परिक्षण करने के लिए केवल केमिकल खरीदने पड़ते है.
  • धन्यवाद

Please Follow us

https://youtube.com/digitalkheti

किसान क्रेडिट कार्ड

    इसमें बैंक किसानो को फसल उगाने के लिए ऋण देती है.

  • यह ऋण किसानो को 6 महीने के लिए दिया जाता है.
  • ताकि किसानो को फसल उगाने के लिए पैसे के कमी न हो.
  • किसान कोई सी भी फसल उगाने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड द्यारा ऋण ले सकते है.
  • किसान के लिए उसकी नजदीक की बैंक की शाखा से ही किसान क्रेडिट कार्ड बनता है
  • यह एक प्रकार का किसान को ऋण है जिसको किसान क्रेडिट कार्ड का नाम दिया गया है.
  • इसको किसान सीधे बैंक से ले सकता है किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं है.

किसान क्रेडिट कार्ड कौन ले सकता है

  • किसान क्रेडिट कार्ड किसानों को ही मिलता है.
  • इसके लिए किसान के नाम खेती होनी चाहिए.
  • किसान के पास खाता खसरा पावती किसान के नाम होनी चाहिए.
  • बैंक में खाता होने चाहिए.
  • किसान के पास अन्य बैंक से ऋण नहीं होना चाहिए.

किसान क्रेडिट कार्ड के लिए कागजात

  • किसान का खाता खसरा नक़ल.
  • पहचान पत्र.
  • बैंक में खाता.
  • अन्य बेंको से नों-डूज.
  • फोटो.
  • पटवारी द्यारा फसल का प्रमाण पत्र

किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट

  • किसानो को इस कार्ड के द्यारा जो ऋण दिया जाता है उसकी लिमिट(सीमा) का निर्धारण निम्न प्रकार किया जाता है-
  • खेती की जमीन कितनी है
  • फसल का प्रकार- सामान्य फसल व व्यापारिक फसल.
  • सिंचित व असिंचित फसल.
  • साल में कितनी फसले बोते है, आदि.

कितना ऋण किसान को मिलता है

  • किसान क्रेडिट कार्ड में ऋण की सीमा- यदि किसान व्यापारिक व सिंचित फसल बोते है, तथा किसान के पास ज्यादा खेती की जमीन है तो ज्यादा ऋण किसान को मिलता है.
  • साधारण रूप से मान सकते है की 2 हेक्टर सिंचित व सामान्य फसल लगाने पर किसान को 1 लाख तक का ऋण किसान क्रेडिट कार्ड पर मिल जाता है.

      ऋण का भुगतान

  • किसान क्रेडिट कार्ड के ऋण का भुगतान साल में दो बार 6-6 महीने में करना पड़ता है.
  • ऋण का भुगतान सितम्बर और  फरवरी-मार्च में करना पड़ता है.
  • तथा भुगतान करने के तुरंत बाद अगली फसल के लिए किसान वापिस ऋण ले सकते है.

किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज

  • प्राथमिक कृषि सहकारी समितिऑ जो जिला सहकारी बेंको से लिंक रहती है उनमे ब्याज का प्रतिशत कम रहता है मध्यप्रदेश में यह शून्य है.
  • तथा जो किसान क्रेडिट कार्ड राष्ट्रीयकृत व प्राइवेट बेंको द्यारा दिया जाता है उसमे 3% ब्याज किसान को देना पड़ता है.

जिला सहकारी बैंको का किसान क्रेडिट कार्ड

  • इन बैंको किसानो  को लगभग 30% राशि का कृषि आदान-खाद बीज एवं कीटनाशी आदि दिए जाते है.
  • इस आदान का भी भुगतान 6 महीने के बाद करना है.
  • व लगभग 70% राशि किसानो को नगद दी जाती है.
    राष्ट्रीयकृत बैंको का किसान क्रेडिट कार्ड 
    इसमें किसानो को केवल राशि दे जाती है.
    ये बैंक किसानो को कृषि आदान नहीं देती है.
    किसान क्रेडिट कार्ड ऋण का समय पर भुगतान करने पर 3-4 वर्ष की रिकार्ड अच्छा रहने पर ऋण की सीमा भी बड़ा दी जाती है.

किसान क्रेडिट कार्ड का लाभ

  • एक बार किसान क्रेडिट कार्ड किसान का बन जाने पर किसान को हर 6 माह में फसल उगाने के लिए आसानी से पैसे मिल जाते है.
  • किसान क्रेडिट कार्ड ऋण पर बैंक की ब्याज दर बहुत कम होती है.
  • किसान को किसी साहूकार से ज्यादा ब्याज पर पैसे लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती है.
  • ऋण का भुगतान करने के लिए किसान को पर्याप्त समय मिलता है.

किसान क्रेडिट कार्ड का भुगतान न करने पर 

  • बैंक द्यारा दिए गए समय पर किसान क्रेडिट कार्ड के ऋण का भुगतान न करने पर ज्यादा बैंक ब्याज किसान से लिया जाता है.
  • इसलिए किसान को ऋण का भुगतान समय पर करना चाहिए.
  • ज्यादा जानकारी या किसान क्रेडिट कार्ड बनबाने के लिए किसान भाई नजदीक के बैंक में संपर्क करे.
  • इस तरह किसान भाई बैंक से फसल उगने के लिए लोन ले सकते है, जिसको लेना बहुत ही आसान है.

धन्यवाद.

Please Subscribe us on

https://youtube.com/digitalkheti.

किसान क्रेडिट कार्ड- किसान क्रेडिट कार्ड की जानकारी के लिए गूगल या यू ट्यूब पर खोजे ——डिजिटल खेती ——-Digital Kheti———