कृषि तकनीकि प्रबंधन एजेंसी

कृषि तकनीकि प्रबंधन एजेंसी (आत्मा),

AGRICULTURE TECHNOLOGY MANAGEMENT AGENCY (ATMA)

  • यह एक केन्द्र सरकार की परियोजना है जो राज्य व केंद्र दोनों द्वारा मिल कर चलाई जाती.
  • यह पूरी तरह खेती के उच्च व नवीन तकनीकि के विस्तार के लिए है.
  • यह योजना भारत देश के सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों कृषि विभाग के अधीन चल रही है.
  • विभिन्न कृषि के केन्द्रों में चल रही अनुसन्धान व उन्नत तकनीकि को किसानों तक पहुचाने का काम कर रही है.
  • जिले के आत्मा की सरंचना-
  • परियोजना संचालक
  • उप परियोजना संचालक
  • बिकासखण्ड तकनीकि मेनेजर
  • सहायक तकनीकि मेनेजर
  • किसान मित्र
  • किसानों के लिय विस्तार के विभिन्न साधन –
  • प्रशिक्षण – इसमें किसानों को एक जगह ले जाकर प्रशिक्षण दिलवाया जाता है.
  • भ्रमण – इसमें किसानों को जगह जगह भ्रमण कराया जाता है.
  • प्रदर्शन – इसमें तकनीकि के प्रदर्शन के लिए सीमित किसानो को आदान(खाद, बीज व दवाई) प्रदान किये जाते है.
  • अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन – इसमें भी वैज्ञानिकों की अनुशंषा के अनुसार आदान प्रदान किये जाते है तथा यह प्रदर्शन वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में किया जाता है.
  • फार्म फील्ड स्कूल – इसमें चयनित किसानों के यहाँ एक हेक्टर का प्रदर्शन लगाया जाता है, व किसानों के समूह को फसल की विभिन्न अवस्था पर पैदावार, रोग व कीड़ो के बारे में मार्गदर्शन दिया जाता है.
  • किसान संगोष्ठी – इसमें किसानों को विभिन्न वैज्ञानिकों व विभागों के अधिकारिओ द्वारा किसानों को खेती आदि के बारे में मार्गदर्शन दिया जाता है.
  • क्षमता विकास प्रशिक्षण – इसमें किसानों को ग्राम स्तर पर समूह में खेती व खेती से सम्बंधित अन्य व्यवसाय विषय पर मार्गदर्शन दिया जाता है.
  • नवाचार – इसमें किसानों के यहाँ या समूह में खेती या खेती से सम्बंधित अन्य की नवीन तकनीकि का प्रदर्शन किया जाता है.
  • सीड मनी- इसमें किसानों के समूह बनाकर कुछ आर्थिक सहायता दी जाती है, ताकि वो समूह में या खेती में कुछ अच्छा कर सके.
  • उत्कृष्ठ किसान अथवा समूह पुरूस्कार – जो किसान या किसानों का समूह खेती, पशुपालन, रेशमपालन, उधानिकी फसलों, मछलीपालन या अन्य में कुछ अच्छा करते है तो उनको प्रोत्साहित करने के लिए पुरूस्कार दिया जाता है.
  • किसान मेला – इसमें जिले स्तरपर हर साल, कृषि की विभिन्न कंपनियों व विभिन्न विभागों द्वारा प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है. जिसमे जिले के अधिक अधिक से किसानों को उन प्रदर्शनी में आमंत्रित किया जाता है.
  • किसान मित्र – यह हर दो गाँव में बीच में एक गाँव का ही पढ़ा लिखा किसान रहता है जो किसानों को गावों में खेती आदि के बारे में जानकारी देता है एवं विभाग के विभिन्न विस्तार की क्रियाविधियो को करने में मदद करता है.
  • प्रशिक्षण या भ्रमण में किसानों को 3-10 दिन तक, जिले में, जिले के बाहर या राज्य के बाहर ले जाया जाता है. इसमें कृषि के विभिन्न संस्थानो, कृषि विज्ञानं केंन्द्रों, प्रगतिशील किसानों आदि के यहाँ ले जाया जाता है, तथा किसानों कों खेती, पशुपालन, रेशमपालन, उधानिकी फसलों, मछलीपालन या अन्य के बारे में नवीन व उन्नत तकनीकि की जानकरी दिलवाई जाती है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

How to claim crop insurance

How to apply for crop Insurance.
  • How to claim crop insurance.
  • Debated Farmers- (compulsory)- Farmers who have credit card/Kisan Credit Card (KCC) or loan from the bank. They must have crop insurance. Banks insure their crop if they have credit card from the bank compulsorily. The bank will take insurance premium from their loan account. So, there is no more problem for these debated farmers. If they want to make changes in crops or others information they can contact to their bank.
  • Undebated Farmers- farmers who do not have credit card or loan from the bank can apply for crop insurance. They are advised to take crop insurance essentially.
  • Document for undebated farmers-
  • Completely filled Crop Insurance Application.
  • Khata khasra/bhoo adhikar patrika/Document of agriculture/crop land.
  • Crop sowing Certificate from Patwari/field agriculture officer.
  • Identity Card- Aadhar Card, Voter-ID, Rashan Card or Pan Card etc.
  • Premium Amount
  • All these documents are deposited with premium in your bank.
  • How to know Premium amount of insurance- contact agriculture department of your block or District, bank where farmer has his account. They can search online to this website – www.pmfby.gov.in.
  • Last date of insurance- Farmer can insured their crops up to last date from the date of sowing.
  • Last date of crop insurance is 15 January for rabi crops and 31 august for kharif crops. Up to this date farmers can deposit premium amount in their bank. Sometimes dates may vary according to area.
  • The premium amount is 1.5% of insured amount for Rabi Crops and 5% for cash & commercial crops and 2% for Kharif Crops, of insured amount.
  • For example, insured amount for wheat crop is 54000 Rs. /ha then the premium amount @ 1.5 % will be (54000*1.5)/100 = 810 Rs. /ha.
  • Insured amount of crops- it is decided by the district level technique committee under chairmanship of District Collector.
  • Alternate of Loss compensation/reimbursement – in case of hailstorm, landslide, or water flooding, compensation will be done on individual basis.
  • Failure of sowing- if sowing is not competed in 75% of crop sowing area then compensation is given by the insurance company. Insurance amount is paid on the basis of average yield data at the end of season.
  • if losses occur 15 days after crop cutting due to unseasonal rain or cyclone then, compensation is provided to farmers accordingly.
  • Procedure of estimating losses reimbursement/compensation-
  • Crop cutting experiment are done by the field agriculture officer or Patwari officers in each patwari halkawise in gram panchayat/gram/village. In this experiment, crop of 5*5meter square area within field is harvested and after threshing, data are taken of wet and dry crop yield. This crop cutting experiment are done by smart mobile application, in this photo are taken of crop field, crop cutting, threshing and weighing of crop yield of 5*5meter square area. All these data are sent online by the help of mobile app. Rational Reimbursement is provided to farmer if the average yield of these experiment is lower than district average yield of last years.
  • In case of loss in crops yields, the insured amount proportionately will come directly and automatically in farmers accounts.
  • For more information farmer can contact banks, primary agriculture cooperative committee, agriculture department, insurance company or online.
  • courtesy- pmfby.gov.in

फसलों का बीमा क्लेम

  • प्रधान मंत्री फसल बीमा के लिए आवेदन कैसे करे ?
  • फसलों का बीमा क्लेम
  • योजना का लाभ कैसे उठाये-
  • ऋणी कृषक (अनिवार्य आधार पर) – जिन किसानो के पास किसान क्रेडिट कार्ड है, या जिन्होंने बैंक से (15 सितम्बर से 15 जनवरी तक)  लोन लिया है उनको बीमा करवाना अनिवार्य है. इनको बैंक में जाकर संपर्क करना है, ऋणी किसानों का बीमा बैंक स्वत कर देती है. बैंक को ऋणी किसान का बीमा करना ही पड़ता है.
  • अऋणी कृषक (ऐच्छिक आधार पर)- जिस किसान के पास किसान क्रेडिट कार्ड नहीं है एवं बैंक से लोन नहीं लिया है वे किसान भी बीमा करा सकते है, उनको सलाह है कि वो भी बीमा अनिवार्य रूप से कराये.
  • अऋणी किसान के लिए आवश्यक दस्तावेज –
  • पूरी तरह भरा हुआ बीमा  प्रस्ताव पत्र. (बैंक या कृषि विभाग से ले)
  • भू अधिकार पत्रिका/ खाता खसरा  
  • पटवारी/ ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी से प्रमाणित बुवाई प्रमाण पत्र
  • पहचान पत्र (आधार कार्ड, वोटर आई डी, राशन कार्ड, पेन कार्ड) की फोटोकॉपी
  • प्रीमियम राशि, ये सभी ले जाकर जिस बैंक में उसका खाता है उसमे  जमा करे.
  • प्रीमियम राशि अपने खाते में जमा कराये, वहा से बैंक राशि को बीमा कंपनी के खाते में जमा करेंगी.
  • प्रीमियम राशि कैसे पता करे – कृषि विभाग में, या बैंक में जहा से किसान क्रेडिट कार्ड लिया है, या ऑनलाइन मोबाइल या कम्पूटर पर इस www..pmfby.gov.in वेवसाईट पर जाकर पता करे.
  • प्रीमियम की अंतिम तारीख –
  • किसान बुवाई के बाद अंतिम तारीख तक बीमा करा सकते है.
  • बैंक द्वारा  बीमा की प्रीमियम राशि लेने की अंतिम तारीख ऋणी व अऋणी किसानो के लिए 15 जनवरी है.
  • प्रीमियम दर- रबी फसलों के लिए 1.5 % व नगदी व वाणिज्य फसलों के लिए 5 % बीमित राशि का.
  • बीमित राशि – ऋणी व अऋणी किसानो के लिए  प्रत्येक जिले की जिला स्तरीय तकीनीकी  समिति दयारा कलेक्टर महोदय की अध्यक्षता में, उस क्षेत्र की सभी फसलों के लिय बीमित राशि निर्धारित की जाती है.
  • क्षतिपूर्ति के विकल्प –
  • ओलावृष्टि, भूस्खलन एवं जल प्लावन की स्थिति में व्यक्तिगत क्षतिपूर्ति की जाएगी.
  • बुआई की विफलता- यदि संभावित बुवाई क्षेत्र  के 75% क्षेत्र में बुवाई न होने पर क्षतिपूर्ति की जाएगी.
  • मौसम के अंत में औसत पैदावार आंकड़ो के आधार पर दावा भुगतान किया जायेगा.
  • फसल कटाई के बाद 15 दिन तक चक्रवात या बेमौसम बारिश से नुकसान होने पर क्षतिपूर्ति की जाएगी.
  • क्षतिपूर्ति का तरीका – इसमें हर पटवारी हलके में कृषि बिभाग के फील्ड अधिकारी व राजस्व विभाग के पटवारी अधिकारी  द्वारा फसल कटाई प्रयोग किये जाते है. इसमें खेत के अन्दर से 5*5 वर्ग मीटर  क्षेत्रफल से फसल, पकने पर काटी जाती है, फिर इसकी थ्रेशिंग करके गीले व सुखाकर उपज का वजन लिया जाता है.
  • यह फसल कटाई का प्रयोग स्मार्ट मोबाइल एप की सहायता से किया जाता है इसमें खेत का फोटो,फसल की कटाई करने का फोटो, 5*5 वर्ग मीटर की उपज के फोटो ऑनलाइन भेजे जाते है, फिर उस हलके की या एरिया की औसत उपज के आधार पर क्षति पूर्ति की जाती है. यदि इन फसल कटाई प्रयोगों की  औसत उपज, जिले की औसत उपज से कम आती है, तो उसी अनुपात में किसानों को बीमा राशि का भुगतान किया जाता है.
  • नुकसान होने पर या बीमा मिलने की दशा में पैसे किसान के खाते में स्वत आ जाते है.  
  • ज्यादा जानकारी के लिए किसान भाई निकटतम बैंक या प्राथमिक कृषि सहकारी समिति, कृषि विभाग या आपके जिले में बीमा करने वाली कंपनी के ऑफिस या कस्टमर केयर नंबर पर संपर्क करे.
  • Photo courtesy fr fmfby.com.
  • विजिट करे हमारे यूट्यूब चैनल – डिजिटल खेती – Digital Kheti—-
  • बीमा की पूरी जानकारी के लिए इस वीडियो को देखे या लिंक पर क्लिक करे –
  • https://youtu.be/yKpgx7L5en4

लहसुन की वैज्ञानिक खेती, Garlic Production

लहसुन की खेती

  • लहसुन की खेती के लिए दोमट, बलुई दोमट तथा काली दोमट मिटटी उपयुक्त है, जिसमे कार्बनिक पदार्थ ज्यादा हो व उचित जल निकास हो.
  • लहसुन की किस्म- जी.-1, जी.-41, जी.-50, जी.- 282, जी.- 313, ऊटी-1 आदि.
  • किस्मों की जानकारी के लिए ,अपने नजदीकि की बड़े जिले में या अपने जिले में कृषि विज्ञान केंद्र या अपने जिले में उधानिकी या कृषि विभाग में भी संपर्क कर सकते है.

  • खेत की  तैयारी- 2-3 बार खेत की जुताई करे, पाटा चलाकर खेत को समतल करे. इसके बाद उपयुक्त आकर की क्यारिया बनाये.
  • बुवाई का समय – अक्टूबर – नवम्बर माह.
  • बीज दर – 7-10 क्विंटल/हेक्टर.
  • बीज उपचार – इसमें कार्बेन्डाजिम  2.5 ग्राम/किलो.कलिया (क्लोव) की दर से बीज उपचार करते है – इसमें 2.5 ग्राम दवाई को एक किलो क्लोव की दर से मिलाते है. जैसे लहसुन की कलिया (बीज) 700 कि.ग्रा. बुवाई के लिए ले रहे है तो इसमें 1.75 कि.ग्रा. कार्बेन्डाजिम बीज उपचार के लिए चाहिए.  दवाई की मात्रा = (2.5*700)/1000.
  • खाद एवं उर्वरक की मात्रा –
  • 25-50 टन/हेक्टर सड़ी हुई गोबर की खाद.
  • 200 कि.ग्रा. डी.ए.पी., 100 कि.ग्रा. यूरिया, 100 कि.ग्रा. पोटाश, 50 कि. ग्रा. दानेदार सल्फर,
  • या 200 कि.ग्रा. कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, 100 कि.ग्रा. यूरिया, 300 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट, 100 कि.ग्रा. पोटाश, 50 कि.ग्रा. दानेदार सल्फर.
  • गोबर की खाद को बुवाई से 15-20 दिन पूर्व खेत में अच्छी तरह मिलाये. सभी उर्वरकों को बुवाई के समय डाले व यूरिया को 30-35 दिन बाद खडी फसल में डाले.
  • लहसुन की बुवाई – इसमें लहसुन की गांठ को रगड़कर कलिया निकाली जाती है इन कलियों (क्लोव) की बुवाई की जाती है.
  • कलियों को 15*7.5 -10 सेमी.की दूरी पर बोया जाता है. लाइन से लाइन की दूरी 15 सेमी. व पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी पर कलियों की बुवाई की जाती है.
  • बुवाई के समय ध्यान रखना है कलिओ की नुकीली साइड ऊपर रहे. तथा कलिओ को 4-5 सेमी की गहराई पर बुवाई करते है.
  • कम क्षेत्रफल में बो रहे है तो मजदूरों से बुवाई करे, ज्यादा क्षेत्रफल में बुवाई मशीन का प्रयोग करे.
  • खरपतवार – स्टॉम्प- बुवाई के एक दो दिन के अन्दर स्प्रे करे.
  • Quizalofop ethyl 5% EC+ Oxyfluorfen 23.5% EC
    क्युजालोफोप एथिल + ओक्सिफ़्लुओरफेन
  • यह फसल में वुबाई/रोपाई के बाद जब खरपतवार 4-5 पत्ती की अवस्था में हो तब डाली जाती है.
  •  कीड़े व रोग – इसमें रस चूसने वाले कीड़े थ्रिप्स लगते है इसके नियंत्रण के लिए लेम्बडासाईंहेलोथ्रिन +थाईमेथाक्जोम या लेम्बडासाईंहेलोथ्रिन का प्रयोग करे. और भी कीटनाशी आते है बाजार में उनका भी इस्तेमाल कर सकते है.
  • लहसुन में बेंगनी रोग लगता है इसके नियंत्रण के लिए 2.5 ग्राम/लीटर स्प्रे करे.
  • सिंचाई (पानी) – सर्दी के समय 10-15 दिन में एवं गर्मी में 5-7 दिन में सिचाई करे.
  • सिचाई क्यारी बनाकर मेड नाली पध्दति से करे या स्प्रिंकलर का भी प्रयोग कर सकते है.

 

 

  • पत्तिया पीली होने पर सिंचाई को बंद करे, इसके कुछ  दिन बाद लहसुन कंदों की खुदाई करे.
  • लहसुन की पत्तियो को आपस में बांधकर 20-25 के झुण्ड में सुखाये.
  • अच्छी तरह सूखने के बाद हवादार स्थान पर स्टोर करे. या हवादार प्लास्टिक के बोरो में भरकर हवादार स्थान पर भण्डारण करे.
  • उपज – 175-200 क्विंटल/हेक्टर रहती है.
  • ज्यादा जानकारी के लिए विजिट करे यू ट्यूब चैनल – डिजिटल खेती – Digital Kheti—

 

लहसुन प्याज व गेंहू में खरपतवार नियंत्रण

लहसुन प्याज व गेंहू में खरपतवार नियंत्रण,

गेहूं लहसुन व प्याज में खरपतवार का नियंत्रण,

Weed Control in Wheat Garlic & Onion,

  • गेहूं में खरपतवार नियंत्रण
  • गेहू की बुवाई पलेवा करके सीड ड्रिल से करनी चाहिए क्योकि पलेवा करके, लाईन में बुवाई करने से खरपतवार का प्रकोप कम होगा व खरपतवार को आसानी से नियंत्रित कर सकते है.
  • गेहू में मुख्यत: दो प्रकार के खरपतवार उगते है . चौडी पत्ती के एवं सकरी पत्ती के खरपतवार.
  •  खरपतवारनाशी
  • 1. Clodinofop-propargyl 15% + Metsulfuron-methyl 1% WP
    क्लोडिनोफोप –प्रोपर्जिल15% मेटसल्फूरोन-मैथिल 1% WP
  • यह सकरी पत्ती के खरपतवार गुल्ली डंडा (फेलेरिस माइनर ), व जंगली जई (wild oat), व
  • चोडी पत्ती के खरपतवार बथुआ ,कृष्णनील, सेंजी, जंगली प्याज, सत्यानाशी, चटरी मटरी, जंगली पालक, मेडीकागो आदि को नष्ट करता है.
  • यह बुवाई के 20-30 दिन के बाद जब खरपतवार 5-7 पत्ती की अवस्था में होती है तब प्रयोग करते है.
  • मात्रा- 160 ग्राम/एकड़.
  • 2.Carfentrazone-ethyl 40% DF (कार्फेंटराजोन एथिल)
  • इसको बुवाई 20-30 दिन के बाद उपयोग करते है जब खरपतवार 2-3 पत्ती की अवस्था की होती है.
  • यह चोडी पत्ती के खरपतवार- हिरनखुरी (convolvulus sp.), कृष्ण नील (Anagallis), बथुआ(chenopodium), सत्यानाशी (argimone sp), चटरी मटरी (vicia sp.), बटन वीड (malva sp), मकोई (solanum sp), बड़ी दूधी(euphorbia) आदि को मारता है.
  • मात्रा- 20 ग्राम एक एकड़ में .
  • 20 ग्राम दवाई को 100-200 मिली हलके गर्म पानी में घोल ले इसको 8-10 मग्गा (डिब्बा) पानी में मिला ले व 15 लीटर के पानी वाले पम्प में एक मग्गा डालकर एक एकड में स्प्रे करे.
  • एक एकड़ में 8 से 10 पंप का स्प्रे करे .
  • 3. Clodinofop-propargyl 15% wp.
    क्लोडिनोफोप –प्रोपर्जिल
  • यह सकरी पत्ती के खरपतवार को नियंत्रित करता है.
  • यह गेहू की बुवाई के 35-45 दिन के बाद जब खरपतवार 5-7 पत्ती की अवस्था में होती है तब प्रयोग करते है.
  • मात्रा- 160 ग्राम/एकड़.
  • 4. Metsulfuron-methyl 20% WP
    मेटसल्फूरोन-मैथिल
  • यह चोडी पत्ती के खरपतवार को नष्ट करता है.
  • इसको गेहु की बुवाई 20-30 दिन के बाद उपयोग करते है जब खरपतवार 3-4 पत्ती की अवस्था की होती है.
  • मात्रा – 8 ग्राम/एकड़.
  • 5. Sulfosulfuron 75% WG
    सल्फोसल्फुरोंन
  • यह सकरी पत्ती एव चोडी पत्ती के खरपतवार को मारता है जैसे – गुल्ली डंडा (फेलेरिस माइनर), सैंजी (melilotus sp ), जंगली जई, बथुआ, लेथाईरस, मेडीकागो आदि.
  • यह गेहू की बुवाई के 25-35 दिन के बाद जब खरपतवार 2-4 पत्ती की अवस्था में हो तब प्रयोग करते है.
  • मात्रा – 5 ग्राम दवा/एकड़ + 500 मिली चिपको.
  • 5 ग्राम दवा को व चिपको को 8 लीटर पानी में घोले.
  • एक पम्प में 1 लीटर डालकर स्प्रे करे.
  • एक एकड़ में 8 पंप का स्प्रे करे.
  • लहसुन एवं प्याज के खरपतवारनाशी

  • Quizalofop ethyl 5% EC+ Oxyfluorfen 23.5% EC
    क्युजालोफोप एथिल + ओक्सिफ़्लुओरफेन
  • यह एक पोस्ट इमरजेन्स खरपतवारनाशी है.
  • यह कोम्वीनेसन लहसुन एवं प्याज में दोनों सकरी व चोडी पत्ती के खरपरवार को नियंत्रण करता है.
  • मात्रा – 300 मिली (Quizalofop ethyl 5% EC) + 100 मिली/ एकड़ (Oxyfluorfen 5% EC)
  • यह फसल में वुबाई/रोपाई के बाद जब खरपतवार 4-5 पत्ती की अवस्था में हो तब डाली जाती है.
  • धानुका उत्पाद –
  • सकूरा (Sakura) 150 एम.एल./एकड़  सकरी पत्ती के लिए.
  • ओक्जीकिल (Oxykill)-90 एम.एल./एकड़  चौड़ी  पत्ती के लिए.
  • भी प्रयोग कर सकते है.
  • सावधानिया
  • खरपतवारनाशी का प्रयोग करने से पूर्व वैज्ञानिक सलाह जरूर ले व पैकिट के साथ आने वाले लीफलेट को जरूर पड़े.
  • दवाई छिड़कने के बाद पंप को अच्छी तरह थोडा यूरिया डालकर साफ कर ले .
  • खरपतवारनाशी का प्रयोग करते समय खेत में नमी होना आवश्यक है.
  • यह सभी केमीकल/टेक्नीकल नाम है, ये किसानो को याद रखना चाहिए. हर कंपनी के ब्रांड नाम अलग अलग होते है, अत: एवं किसी ब्रान्डेड कंपनी के ही खरपतवारनाशी प्रयोग करने चाहिए

Weed Control in Wheat Crop, Weedicide in Wheat,

Weed Control in Wheat Crop, Weed of wheat,
Weedicide in Wheat,

  • Weed is a major problem in Wheat. Weedicides are sprayed to control weeds in wheat
  • Name of weedicide which is used to control weed in Wheat crop-
  • Clodinafop Propargyl 15% + Metsulfuron Methyl 1% WP.
  • This is used after 20-25 days of sowing of crop or in standing crop.
  • This controls both types narrow and broad leaf of weed.
  • Weedicide- it has two packet one of is 160-gram powder and second is 500 ml liquid. 160-gram powder is weedicide, and 500 ml liquid which increase the efficiency of weedicide.
  • Solution Preparation– Take 10 glass water in a bucket. Mix 160-gram powder in this and then mix 500 ml liquid in 10 glass water thoroughly with the help of wooden stick. Now solution is ready to use.
  • Take one glass of mixture solution in a pump and fill the pump with water and spray it on the standing crop.
  • 10 pumps are sprayed over one-acre crop area.
  • Cost of weedicide for one acre is 550 Rs.
  • Precaution- Spray weedicide on crop when filed has sufficient moisture.
  • Clean the pump completely after weedicide spray.
  • For more information visit —Digital Kheti —on YouTube..
  • https://www.youtube.com/channel/UC8y4ihEQyARwqQMGbzR4ISA.

गेंहू फसल में खरपतवार का नियंत्रण

    • गेंहू के खरपतवारनाशी ,
    • गेंहू में खरपतवार का नियंत्रण,
    • गेंहू फसल में खरपतवार एक मुख्य समस्या है, इसके नियंत्रण के लिए बुवाई के बाद खडी फसल में खरपतवारनाशी का स्प्रे किया जाता है.
    • खरपतवारनाशी का नाम – क्लोडिनाफोप प्रोपरजिल 15% + मेटसल्फूरोन मैथिल 1 % डवल्यू.पी.
    • Clodinafop Propargyl 15% + Metsulfuron Methyl 1% WP.

  • इसका प्रयोग खडी फसल में बुवाई के 20-25 दिन बाद किया जाता है.
  • यह सकरी पत्ती व चौड़ी पत्ती दोनों प्रकार के खरपतवारों को नष्ट करता है.
  • खरपतवारनाशी – इसके डिब्बे में दो पैकिट  आती है एक 160 ग्राम दवाई (पावडर रूप में)का और दूसरा 500 मिली. (द्रव रूप में)का पैकेट जो खरपतवारनाशी की कार्य करने की क्षमता को बढाता है.
  • घोल तैयार करना – इसके लिए एक बाल्टी में 10 लीटर  या 10 ग्लास पानी लीजिये. इसमें पहले 160 ग्राम दवाई मिलाये इसके बाद 500  मिली. के पैकेट को मिलाये व लकड़ी आदि की सहायता से अच्छी तरह से घोल ले.
  • एक पम्प में एक लीटर या एक ग्लास दवाई व पम्प को पानी से भरे व स्प्रे करे.
  • यह दवाई एक एकड़ के लिए है इसलिए एक एकड़ में 10 पम्प दवाई का स्प्रे करे.
  • इसकी कीमत 550 रुपये रहती है एक एकड़ के लिए.
  • सावधानी –
  • इसके प्रयोग के समय खेत में नमी होना आवश्यक है की अन्यथा यह अच्छी तरह काम नहीं करती है.
  • दवाई के प्रयोग करने के बाद पम्प को अच्छी तरह साफ करके रखे.
  • ज्यादा जानकारी के लिए खोजे यूट्यूब चैनल – डिजिटल खेती —Digital Kheti—
  • https://www.youtube.com/channel/UC8y4ihEQyARwqQMGbzR4ISA

 

प्रमाणित बीज उत्पादन

बीज उत्पादन

  • बीज कृषि में एक मुख्य आदान है.
  • अच्छी बीज बोयेंगे तो अच्छा उत्पादन होगा.
  • बीज उत्पादन- बीज व्यवसाय
  • सोसाइटी का निर्माण
  • अपने गाँव या समीप के गाँव के 21 या उससे अधिक लोगो का समूह बनाये.
  • उनमे से अध्यक्ष व सचिव व संस्था का कोई नाम चुनकर, अपने जिले में सोसाइटी का पंजीयन कराये.
  • संस्था का पंजीयन
  • अपने जिले में किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट(सी.ए.) से मिले.
  • व आपकी संस्था की स्थापना का पंजियन जिले/पंचायत में करवाए .
  • सी.ए. आपका जी.एस.टी. में भी पंजीयन करवा देंगे.
  • संस्था का करेंट अकाउंट खुलवाये
  • लाइसेंस 
  • अपने ब्लॉक में कृषि अधिकारी से बीज का लाइसेंस बनवाये.
  • इसके बाद अपने जिले में बीज की ग्रेडिंग करने वाले तलाशे.
  • उससे अग्रीमेंट करे अव आप बीज उत्पादन के लिए तैयार है.
  • बीज उत्पादन मात्रा
  • कितनी बीज के मात्र आपको लगेगी, पैसा व साधन कितने उपलब्ध है उस आधार पर बीज उत्पादन की मात्रा निश्चित करे.
  • प्रमाणीकरण पंजीयन
  • अपने जिले के बीज प्रमाणीकरण अधिकारी से मिले.
  • उसके बताये अनुसार जमीन के कागज, पहचान पत्र व प्रमाणीकरण शुल्क देकर बीज उत्पादन का पंजीयन करे.
  • बीज निरीक्षक
  • किसी ज्ञात जगह से आधार बीज खरीदकर बुवाई करे जब आप बीज की बुवाई के बाद तो तीन चार बार बीज प्रमाणीकरण अधिकारी फसल का निरिक्षण करने आएगा.
  • उसके दयारा बताये गए निर्देशों का पालन करे ताकि बीज उत्पादन सफल रहे..
  • फसल की कटाई, थ्रेशिंग, भण्डारण, व पैकिंग
  • फसल कटाई करके भण्डारण करे.
  • उसके बाद बीज निरीक्षक/बीज प्रमाणीकरण अधिकारी बीज के सैंपल ले जायेगा
  • व उसमे नमी, शुद्धता आदि की जाँच करके रिपोर्ट तैयार करेंगा.
  • ग्रेडिंग   
  • बुवाई से कुछ महीने पूर्व उत्पादित बीज को ग्रेडिंग प्लांट पर ले जाये व बीज की ग्रेडिंग करवाए इसके बाद निर्धारित मात्रा नये बेगो में भरकर प्रमाणित बीज का टेग लगाकर पैकिंग करे.
  • अब प्रमाणित बीज बेंचने के लिए तैयार है.
  • बीज को बेचना
  • अपने गाँव या आसपास के गाँव में बीज को बेंचे, कृषि विभाग को दे सकते है. खुद की दुकान लगाकर बेंच सकते है.
  • प्रमाणित बीज    
  • बीज उत्पादन पर सरकार अनुदान भी देती है इसका लाभ लेने के लिए कृषि विभाग में संपर्क करे.
  • कुछ सालो बाद जब आप ज्यादा मात्रा में बीज उत्पादन करना चाहते है तो बीज निगम या किसी सरकारी बीज वितरण/उत्पादन संस्था से सम्पर्क कर सकते है वो हर साल अपने लिए बड़ी मात्रा में बीज उत्पादन करने के लिए आवेदन करवाते है. ये संस्थाये बीज उत्पादन के लिए अग्रिम राशी भी उपलब्ध भी कराती है इसके लिए आपकी संस्था/सोसाइटी थोड़ी पुरानी होनी चाहिए, उसका रिकॉर्ड अच्छा हो, ज्यादा मात्रा में बीज उत्पादन करने की क्षमता होनी चाहिए, तथा लगातार इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करना चाहिए.
  • बीज उत्पादन के लिए ऋण     
  • जब सोसाइटी बीज को किसी पंजीकृत गोडाउन में रखती है तो उसकी पाबती पर बैंक बड़ी ही आसानी से लोन संस्था को दे देगी.
  • जब संस्था को तीन साल से ज्यादा हो जाये व आप संस्था का लगातार इनकम टैक्स रिटर्न भरते है तो बैंक आपको आसानी से लोन से देंगी.

मूंगफली उत्पादन की उन्नत तकनीक

मूंगफली उत्पादन की उन्नत तकनीक

Cultivation of Groundnut

उन्नत किस्मे-

किस्म अवधि (दिन) उपज(क्विंटल /हेक्टर )
जे.जी.एन-3 100-105 15-20
जे.जी.एन-23 90-95 15-20
टी.जी.-37 ए 100-105 18-20
जे.एल. 501 105-110 20-25
जी.जी.-20 105-110 20-25

आपके जिले के बाजार में अन्य किस्म भी मिल जाएगी जो खाद, बीज बेचते है उन डीलर के पास.

मूंगफली

भूमि की तैयारी- मूंगफली की खेती विभिन्न प्रकार मृदाओ  में की जा सकती है. लेकिन जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए. एक बार मिटटी पलटने वाले हल से करके 2-3 वार हैरो से जुताई करे जिससे मिटटी अच्छी तरह भुरभुरी हो जाये इसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर दे

भूमि उपचार- मूंगफली फसल में जमीन के कीड़े व दीमक की समस्या रहती है इसको नियंत्रण करने के लिए फोरेट या  कार्बोफुरान 20 किलों/हेक्टर की दर से जमीन में मिला दे.

खाद एव उवर्रक- मूंगफली में 50 क्विंटल अच्छी हुई गोबर की खाद बुवाई से पूर्व जमीन में मिलाये. तथा उवर्रक में 20 किलों नाइट्रोजन, 60 किलों फास्फ़ोरस एवं 20 किलों पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करे. इन तीनो उवर्रक को बुवाई के समय खेत में डाले. तथा तेलीय फसलों के लिए सल्फर आवश्यक है इसके लिए 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट या 250 किलों जिप्सम का प्रयोग बुवाई के समय करे.

बीज दर – मूंगफली की गुच्छेदार किस्म के लिए 100 किलों व फैलनेवाली जातियो के लिए 80 किलोग्राम/हेक्टर बीज की आवश्यकता होती है.

बुवाई का समय- जून के दुसरे सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बुवाई करे.

दूरी- मूंगफली की गुच्छेदार किस्म के लिए 30*10 सेमी   व फैलनेवाली जातियो के लिए 45*15 सेमी की दुरी पर बुवाई करनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण- फ्लूक्लोरेलिन बुवाई से पूर्व जमीन में मिलाये. व पेंडीमेथालिन बुवाई के 2 दिन के अन्दर करे. तथा खडी फसल में इमिजाथाइपर बुवाई के 20-25 दिन तक कर सकते है.

मूंगफली में मुख्यत  सिंचाई की चार अवस्थाये होती है प्रारंभिक बढवार अवस्था, फूल बनने, फली लगने व फली  भरने की अवस्था, इस समय सिंचाई की आवश्यकता होती लेकिन समय पर वारिश हो तो सिंचाई की जरूरत नहीं है.

प्याज का बीज उत्पादन, प्याज उत्पादन

प्याज का बीज उत्पादन की विधि-

एक वर्षीय विधि

  • बीज की नर्सरी में बुवाई – मई – जून
  • जमीन में रोपाई – जुलाई – अगस्त
  • कन्द – कन्द नवम्बर में तैयार हो जाती है,
  • कन्दो को उखाड़कर कर छाटकर,10- 15 दिन बाद दुसरे खेत में लगा दिया जाता है. और मई के महीने तक बीज तैयार हो जाता है.
  • इस विधि से खरीफ प्याज की प्रजातियों का बीज उत्पादन किया जाता है
  • दो वर्षीय विधि
  • बीज की नर्सरी में बुवाई – अक्टूबर – नबंवर
  • खेत में रोपाई – दिसम्वर अंत या जनवरी के शुरू में.
  • कन्द मई में तैयार हो जाते है.
  • अच्छे कन्दो को छाटकर भण्डारण करते है. और नवम्वर में कन्दो को खेत में लगा देते है.
  • मई तक बीज तैयार हो जाता है. इस विधि से रवी प्याज की प्रजातियों का बीज तैयार किया जाता है.
  • प्याज कन्द उगाने की उन्नत तकनीकि
  • 3-4 जुताई करके खेत को अच्छी तरह तैयार करे.
  • बुवाई और रोपाई का  समय
  • फसल -खरीफ, बुवाई – जून -जुलाई , रोपाई – जुलाई – अगस्त.
  • फसल – रवी, बुवाई – अक्टूबर- नवम्बर, रोपाई – दिसंबर- जनवरी.
  • दूरी
  • रोपाई करते समय लाइन से लाइन – 15 सेमी.
  • पौधे से पौधे की दूरी – 10 सेमी.
  • रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करनी चाहिए.
  • बीज की मात्रा – 7-8 किग्रा. प्रति हेक्टर.
  • खाद एवं उर्वरक
  • गोबर की खाद – 500 क्विंटल
  • कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट – 100 किग्रा. या यूरिया 200 किग्रा.
  • सिंगल सुपर फोस्फेट – 300 किग्रा.
  • पोटाश – 100 किग्रा.
  • नाइट्रोजन की आधा मात्रा, पूरा सुपर व पूरी पोटाश की मात्रा रोपाई से पूर्व डाले व नाइट्रोजन की आधी मात्रा को दो भागो में, रोपाई के 30 दिन व 45 के बाद खेत में डालना चाहिए.
  • सिंचाई – 8-15 दिन के बाद आवश्यकतानुसार करे.
  • खरपतवार नियंत्रण – स्टॉम्प खरपतवारनाशी का उपयोग करे.
  • टरगा सुपर  सकरी पत्ती के खरपतवार के लिए 300 एम.एल. प्रति एकड़, या धानुटोप @ 1 लीटर/एकड़ रोपाई के 2-3 दिन के अन्दर,
  • उसके बाद हाथ से भी खरपतवार नियंत्रण कर सकते है.
  • कीट व रोग नियंत्रण – प्याज में थ्रिप्स के नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट, फिप्रोनिल-5%एस.सी. या थाओमिथोक्जाम या थाओमिथोक्जाम + लेम्डा सायहेलोथ्रिन का उपयोग करे.
  • पर्पल ब्लाच रोग के लिए डाईथेंन एम-45, 2.5 किग्रा.प्रति हेक्टर उपयोग करे.
  • कन्दो की खुदाई – 50% पत्तियाँ जमीन पर गिरने के एक सप्ताह बाद कन्द की खुदाई करे. पत्तो को गर्दन से 2.5 सेमी ऊपर से कन्द से अलग करे.
  • अच्छी, एक रंग की पतली गर्दन वाली दोफाड़े रहित प्याज का एक सप्ताह तक   भण्डारण करे. 4.5 सेमी. से 6.5 सेमी. व्यास के प्याज के कन्द बीज उत्पादन के लिए प्रयोग करते है.
  • बीज उत्पादन के लिए कंदों का लगाने का समय
  • नबंवर का प्रथम सप्ताह या दिसंबर के मध्य तक का समय अच्छा है.
  • रवी मौसम की प्रजातियो के लिए नबंवर के मध्य तक तथा खरीफ मौसम की प्रजातियो को दिसंबर मध्य तक लगाना चाहिए.
  • चुने हुए कन्दो का एक तिहाई काटकर गांठो को 0.1% कार्बेन्डाजिम के घोल में डुबाकर लगाया जाता है.
  • कन्दो को अच्छी तरह तैयार क्यारियों में 45*30 सेमी. की दूरी पर 1.5 सेमी. गहरा लगाते है.
  • बुवाई के लिय 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टर कन्द पर्याप्त है.
  • खाद एवं उर्वरक, – 50 टन गोबर की खाद – बुवाई से 20-25 दिन पहले खेत में डालते है,
  • यूरिया – 100 किग्रा., एस.एस.पी.- 300 किग्रा., पोटाश – 100 किग्रा.
  • 100 किग्रा यूरिया कंद लगाने के 30 दिन बाद डालना चाहिए.
  • खाद को खेत में कन्दो के लगाने के स्थान पर खुरपी से बनाये गए गड्डो में अच्छी तरह मिलाये इसके बाद कन्द को लगाये. खाद, कन्दो के संपर्क में नहीं आना चाहिए.
  • सिंचाई – 8-15 दिन के बाद आवश्यकतानुसार करे.
  • खरपतवार नियंत्रण – स्टॉम्प खरपतवारनाशी का उपयोग करे.
  • टरगा सुपर  सकरी पत्ती के खरपतवार के लिए 300 एम.एल. प्रति एकड़, या धानुटोप @ 1 लीटर/एकड़ रोपाई के 2-3 दिन के अन्दर,
  • उसके बाद हाथ से भी खरपतवार नियंत्रण कर सकते है.
  • कीट व रोग नियंत्रण – प्याज में थ्रिप्स के नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट, फिप्रोनिल-5%एस.सी. या थाओमिथोक्जाम या थाओमिथोक्जाम + लेम्डा सायहेलोथ्रिन का उपयोग करे.
  • पर्पल ब्लाच रोग के लिए डाईथेंन एम-45, 2.5 किग्रा.प्रति हेक्टर उपयोग करे.
  • बुवाई के दो महीने बाद पौधों की जड़ो के पास मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए.
  • अलगाव दूरी – प्याज में पर परागण होता है, तो दो जातियों का बीज उत्पादन करने के लिए उनके मध्य 500 मीटर की दूरी होनी चाहिए.
  • खराव पौधों की छटाई – रोगी एव भिन्न जाति का दिखने वाले पौधों को फूल आने से पहले ही निकाल देना चाहिए.
  • कटाई, मड़ाई, बीज की सफाई, सुखाई, भण्डारण तथा पैकिंग-
  • बुवाई के एक सप्ताह बाद अंकुरण प्रारम्भ हो जाता है, तथा लगभग ढाई माह बाद फूलवाले डंठल बनना शुरू हो जाते है, पुष्प गुच्छ बनने के 6 सप्ताह के अन्दर ही बीज पक जाता है. गुच्छों का रंग जब मटमैला एवं 20 केप्स्यूल में काले बीज दिखाई देने लगे तो गुच्छो की  कटाई करे.
  • सभी गुच्छे एक साथ नहीं पकते है अत उन्ही गुच्छो को काटना चाहिए जिनके बीज छितरने वाले हो. कटे हुए गुच्छों को छायादार पक्के फर्श या या मोटे कपडे के फैलाकर सुखाते है. सूखे हुए गुच्छो को हाथ से कूटकर तिनके आदि को अलग कर बीज को साफ़ करे. बीज को थाइरम से उपचार करके अच्छी तरह साफ़ बीज को डिब्बो या लिफाफों में पैक करे व भण्डारण करे.
  • उपज – औसत उपज 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टर होती है.
  • यदि 300 रुपये किलों या 30000 रुपये प्रति क्विंटल से बीज बिकता है तो कम से कम लगभग 3 लाख तक की कमाई होती है.

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