अधिक उत्पादन के लिए जुताई, Plough for High Production

Adhik Utpadan ke liye Jutai., अधिक उत्पादन के लिए गर्मी की गहरी जुताई,

यह तीन साल में एक बार की जाती है.सभी खेतों की एक ही बार में गहरी जुताई नहीं करे. टुकड़ो में जुताई करवाए.इसमें खेत की 30 सेमी.तक जुताई करते है. यह अप्रैल- मई में की जाती है.

ज्यादातर फसल उगाने का कार्य जमीन के 15 सेमी गहराई तक किया जाता है, फसल उगाने के लिए एक ही स्तर पर बार -बार जुताई करने से जमीन में एक कठोर परत बन जाती है, जिसके कारण बारिश में पानी जमीन के अन्दर नहीं जा पाता है, और बहकर खेत से बाहर निकल जाता है.गहरी जुताई से यह कठोर परत टूट जाती है व खेत की जमीन पानी का अवशोषण करती है.मिट्टी पलटने से जमीन में रहने बाले कीड़े व रोग (कवक) आदि जमीन के ऊपर आ जाते तो ये पक्षिओ द्वारा खा लिए जाते है, व कुछ तेज सूरज की धूप के कारण नष्ट हो जाते हो. जिससे फसलों के कीड़े व रोग कम लगते है. मिट्टी पलटने से जमीन का कचरा नीचे चला जाता है और अच्छी तरह से सडकर खाद बन जाता है. बाद में फसल की तैयारी के लिए खेत की जुताई भी आसानी से हो जाती है व मिट्टी भुरभुरी हो जाती है. इन सभी के कारण फसल का उत्पादन अधिक प्राप्त होता है.

हाइड्रोलिक पलटी प्लाऊ –यह हाइड्रोलिक सिस्टम से चलने वाला रहता है, जिसके कारण इसे केवल हाइड्रोलिक सिस्टम वाले ट्रेक्टर से ही चला सकते है.इसकी कीमत लगभग 35-40 हजार तक रहती है.इससे जुताई करने पर पूरी जमीन की जुताई होती है खेत में विना जुताई वाली जमीन नहीं रहती है.इसकी लागत 4500 रुपये प्रति हेक्टर रहती है.

सामान्य गहरी जुताई वाला प्लाऊ –इसकी कीमत 20-25 हजार रुपये रहती है.इससे गहरी जुताई करने पर कुछ जमीन विना जुताई के रह जाती है.इसकी जुताई की लागत 3 हजार रुपये प्रति हेक्टर रहती है.इस तरह किसान भाई अपनी सुविधा अनुसार प्लाऊ का इस्तेमाल करके गर्मी की गहरी जुताई कर सकते है.

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कम्पोस्ट खाद, आर्गेनिक खाद, कम्पोस्ट उर्वरक, Compost Khad, Organic Manure, Compost Manure,

कम्पोस्टिंग, Composting , फसल अवशेष से कम्पोस्ट खाद बनाना, Composting with Crop/Plant Residue, फसल के कचरे/बायोमास से कम्पोस्ट  खाद बनाना, Composting with Plant/Crop Debris or Biomass, कम्पोस्ट खाद, आर्गेनिक खाद, कम्पोस्ट उर्वरक, Compost Khad, Organic Manure, Compost Manure

इसको तैयार करने के लिए आपको निम्नलिखित सामग्री की जरूरत पड़ेंगी. It needs following items to prepare. फसल के अवशेष – 1400 – 1500 किलोग्राम. Crop Residue – 1400 – 1500 Kilogram. पशु का गोबर – 100 – 150 किलोग्राम. Animal Dung – 100 – 150 Kilogram. मिट्टी – 1500 – 1600  किलोग्राम. Soil – 1500 – 1600 kilogram पानी – 1500 – 2000 लीटर ( आठ से दस ड्रम ), Water – 1500 – 2000 Litres (or 8-10 Drums)

अब इसके लिय जमीन के ऊपर एक टांका बनाने की जरूरत रहती है जिसे पिट, या नाडेप टांका भी कहते है. A Tanka or pit is made on the ground. This is called pit or Nadep Tanka. जिसका साइज़/आकार 12 * 5 * 3 घन फीट रहता है.यानि जिसकी लम्बाई 12 फीट,  चौड़ाई 5 फीट, व ऊंचाई 3 फीट रहती है. इसकी दीवारों में 6-7 इंच के छेद रहते है. छेद एक के ऊपर एक नहीं होने चाहिए. The size of this pit is 12 * 5 * 3 cubic feet. In this the length   the width and the height of the pit are 12, 5 and 3 feet respectively. The holes are kept in the walls of pit. The holes are made in such a manner that these must not be in one line from above to down 

पिट को भरने के लिय सबसे पहले फसल के अवशेषों के छोटे- छोटे लगभग 3-4 इंच के टुकड़े कर लिए जाते है.इसके बाद गोबर व पानी घोल बनाकर उस घोल से पिट के फर्श व दीवारों को अच्छी तरह भिगाकर तर कर देते है. Now the mixture of water and dung is sprayed over the walls of the pit thoroughly with the bucket and mug.

अब पिट के फर्श के ऊपर बायोमास या फसल के अवशेषों को बिछाकर 6 इंच मोटी एक समान परत बनाते है.अब इसके बाद 10-15 किलों गोबर को 100-150 लीटर पानी में घोलकर, अवशेष की परत के ऊपर प्लास्टिक के मग्गे आदि से छिड़कते है एवं पूरी परत को गीला करते है.अब इस अवशेषों की परत के ऊपर पानी व गोबर का घोल डालने के बाद, 100-150 किलोग्राम मिटटी लेकर इसके ऊपर  एक सामान रूप से फैलाते है. व थोड़ा गोबर पानी का घोल डाले. Now uniform layer of 6 inch of the chaffed residues of crop is made in the pit. After this the mixture of 10-15 Kg. dung and 100-150 litres of water is made and poured over the layer of residues. After this well sieved field soil up to 100-150 kilogram is taken and spread uniformly upon the wet layer of residues. Pour some mixture of dung and water again.

इस तरह से फसल अवशेष, गोबर व पानी का घोल व मिट्टी के परत से तीन परत बन जाती है.अब इसी क्रम में तीनो की परत बनाते जाते है.और इस पिट को परत के ऊपर परत बनाकर पिट की दीवार के किनारों से 2-2.5 फीट ऊपर तक  भरते है. So, three layers of crop residue, mixture of dung and water and soil are made. Now these layers are repeated as above and the pit is filled up to 2 – 2.5 feet above the edge of the pit. अब मिट्टी, गोबर व पानी का गाड़ा घोल बनाया जाता है व इस पिट को ऊपर से मिट्टी व गोबर के गाड़े घोल से अच्छी तरह से लेप दिया जाता है.After this paste is made of soil and dung with the water. And now this heap is covered with this paste completely.

15-20 दिन के बाद यह ढेर थोड़ा 1-2 फीट तक नीचे दब जाता है. अब दुबारा इसके ऊपर परत बनाई जाती है व दुबारा पिट को मिटटी व गोबर से लेप दिया जाता है. इस तरह से पूरी तरह से पिट को भरने के लिए 8-10 परत बिछाई जाती है. After 15-20 days the heap gets down so again the layers are made of residue, mixture of dung and water and soil. And the heap is pasted again.8-10 layers are made for to fill the pit completely.

इस तरह 3.5 से 4 महीने में खाद पूरी तरीके से बनकर तैयार हो जाता है व किसान इसकों खेत में इस्तेमाल कर सकते है. इस बिधि से एक साल में तीन बार खाद बना सकते है. और लगभग 80 क्विंटल खाद बनाकर तैयार हो जाता है. So, the compost is ready within 3.5 to 4 months. Now it can be used in crops. In this composting method the compost can be made 3 times within a year. 80 quintal compost is produced in one year.

कम्पोस्टिंग की इस विधि एक साल में लगभग 80 किलोग्राम जैविक नाइट्रोजन,  80 किलोग्राम जैविक फास्फोरस व 80 किलोग्राम जैविक पोटाश पैदा की जाती है. जिसकी कीमत लगभग 7200 रुपये रहती हो जो डी.ए.पी. की चार बोरी , यूरिया की दो बोरी व पोटाश की 3 बोरी के बराबर है. So approx.  80-kilogram organic nitrogen, 80-kilogram organic phosphorus and 80-kilogram organic potash are produced within a year in this method of composting.If we convert this into DAP, Urea and murate of Potash then total cost of the compost will be 7200 Rs. Or 4 bags of DAP, 2 Bags of Urea and 3 bags of Potash.

चने की फसल की उर्वरक अनुशंषा है , नाइट्रोजन – 20 कि.ग्रा. फास्फोरस – 40 कि.ग्रा. व पोटाश 20 कि.ग्रा. रहती है, तो कम्पोस्टिंग की इस विधि से तैयार यह मात्रा चने के दो हेक्टर में इस्तेमाल की जा सकती है. The recommended dose for Chickpea (gram) is 20 Kg. nitrogen, 40 Kg. phosphorus and 20 Kg. Potash, so quantity produce by this composting method can be use in 2 hectares of gram Crop.

सावधानिया – पुरे पिट को एक ही दिन में भरे. ताजा गोबर का इस्तेमाल करे. ढेर में 40-50% तक नमी बनाये रखे.हो सके तो पिट पर छाव रखे. Precautions-Fill the pit same day only. Use fresh dung. And if possible, make shed upon the pit.

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Amrit Pani- Organic Fertilizer-Insecticide

Amrit pani – अमृत पानी

अमृत पानी – इसकों बनाना बहुत ही आसान है. जो किसान जैविक खेती करते है वो इसको घर पर बड़ी ही आसानी से बना कर, किसी भी फसल में इस्तेमाल कर सकते है. Amrit Pani – this is fully organic product which can be made at home easily.

इसको बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है. It Requires following items to prepare.


  • दस किलोंग्राम ताजा गाय का गोबर. it requires 10 kilogram fresh cow dung. old dung should not use for preparing amrit pani.

एक किलोग्राम बेसन यानि चने का आटा – चने के दानों को चक्की से पिसवाकर या दुकान से सीधे बेसन भी खरीद सकते है. One Kilogram chickpea or gram flour is used. the flour can be purchased from the shop or flour can be prepared with the help of flour mill.

100 ग्राम गुड़ – खाने वाला मीठा गुड़ लिया जाता है, गुड़ की गुणवत्ता की चिंता न करे जितना सस्ता मिले उतना अच्छा है. गुड़ हम सभी जानते है गन्ने के रस से बनाया जाता है. 100 gram is jaggery is taken. Quality may be any because in low quality jaggery , low chemicals are used. So low quality jaggery can be purchased. All we know very well that the jaggery is made by using the juice of sugarcane.

एक लीटर गाय का मूत्र लिया जाता है, गाय के मूत्र को कितना समय भी भण्डारण कर सकते है. One liter Cow urine is taken to prepare this. cow urine can be stored for a longtime. storage improves quality of urine.


एक किलो नीम की हरी पत्ती ली जाती है, जिसकीकुचलकर चटनी बना ली जाती है. One kilogram green leaves are taken of Neem or Azadirachtaa. These leaves are crushed well to make paste of these leaves.

250 ग्राम आक की पत्ती लेते है, इन पत्तियो की भी अच्छी तरह से कुचलकर चटनी बना लेते है. 250 gram Leaves of Aak or madar /Calotropis are taken and these leaves are also crushed to make paste. This paste is used.

10 लीटर साफ पानी लिया जाता है. गन्दा पानी इस्तेमाल न करे. 10 liters clean water is taken. Please do not use dirty water. it will deteriorate the quality of Amrit Pani.

मिट्टी का एक ऐसा पुराना मटका लेते है जो इस्तेमाल नहीं हो रहा हों. मटका फूटा न हो व रिस नहीं रहा हो, ऐसा मटका इस्तेमाल करना चाहिए. One old Mud pot is taken. Post must not be broken or leakaged

अब गोबर का पानी के साथ घोल बनाते है और मटके में डाल देते है. फिर बेसन एवं गुड का घोल बनाते है और उसकों मटके के डालते है. इसके बाद गोमूत्र को मटके में डाल दिया जाता है. इसके बाद नीम व आक की कुचली हुई पत्तियो को भी मटके में डाल दिया जाता है. इसके बाद मटके का मुह कपड़े से अच्छी तरह बांधकर, छाव में रख दिया जाता है,. 8-15 दिन में घोल बनकर तैयार हो जाता है. इसकों छानकर, 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ में इस्तेमाल किया जाता है. First make the solution of dung with water and pour it into the mud pot. then the solution of Jaggery and Flour of gram are made with water and these solution are also poured in mud pot. Now pour the urine of cow into pot. in last drop the paste of leaves of Neem and Aak. Now Pour the water to fill the pot up to it neck. some space is kept blank so the solution could not come out at the time of movement of pot from one place to other. At last the mouth of pot is tied with the clothes tightly. after 8-15 days the solution is ready to use. Sieve this solution with cotton cloth and mix this sieved solution with 200 liters of water and use it for one acre cropped area

इसका स्प्रे भी कर सकते है. और सिंचाई की नाली के पास किसी बर्तन या नल लगे ड्रम में भरकर रखे व नाली के पानी में इसे टपकने दे तो यह पुरे खेत में यह चला जायेगा. ड्रिप के साथ भी इस्तेमाल कर सकते है. यह जैविक खाद व जैविक कीटनाशी दोनों की तरह काम करता है. और इसको किसी भी फसल, सब्जी व फलों के पेड़ो में इस्तेमाल कर सकते है. It can be sprayed or can be used with irrigation canal. the solution is filled into a utensil or drum with tap. Now this is kept near the irrigation channel and a small hole in utensil or by opening the tap of drum let it go with the irrigation water. with the irrigation water it will reach to entire field area.

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Green Fodder Production within 10 Days.

Hydroponics – Green Fodder Green Fodder Production within 10 Days हाइड्रोपोनिक्स – हरा चारा 10 दिन में उत्पादन करना. इसमें बिना मिट्टी व खेत के हरा चारे का उत्पादन कर सकते है. इसमें बहुत ही कम जगह, पानी व समय की आवश्यकता होती है. साल के किसी भी महीने में तैयार कर सकते है. डेयरी पशुपालकों को गर्मी में चारे की बहुत आवश्यकता रहती है तो वो लोग इस विधि से आसानी से हरे चारे का उत्पादन कर सकते है.

Production of Green fodder for dairy and other animal with the help of hydroponics method. In this method, soil or field  is not required. It requires very little space, time and water. Fodder can be produced round the year but mostly the problem of fodder comes in summer season (march to June)

  1. इस विधि में हरा चारा उगाने के लिए मक्का, ज्वार या बाजरा का उपयोग किया जाता है. लेकिन अधिकतर  जगह मक्का का ही इस्तेमाल किया जाता है. मक्का आसानी से उपलब्ध हो जाती है क्योकि अधिकतर प्रदेशो में अभी मक्का का उत्पादन किया जाता है. तो अपने नजदीकि के जिले या राज्य में मक्का तलाश सकते है. In this method maize/corn, sorghum and Pearl millet/Bajra can be used. But mostly Maize is used for this because it is easily available in the most of states.
  • अब मक्का के दानों को 24 घंटे तक पानी में रखते है और उनकों पानी सोखने देते है. 24 घंटे बाद पानी से बाहर निकालकर उसको जूट के गीले बोरो पर फैला दिया जाता है, एवं दुसरे जूट का बोरा उसके ऊपर ढक दिया जाता है. बोरो को थोड़ा गीला रखा जाता है.
  • In this method the grain of the maize is soaked in water for 24 hours and after 24 hours the grains are brought out and spread upon the wet jute bag and the grains are covered with other jute bag. The jute bags are kept moist to germinate the grain.
  • एक-दो दिन में मक्के के दाने अंकुरित हो जाते है, इन अंकुरित दानों को प्लास्टिक की ट्रे में समान रूप से फैला दिया जाता है, फिर इन ट्रे को स्टैंड आदि पर रखकर रोज 8-10 बार इन दानों पर स्प्रिंकलर या हैण्ड स्प्रयेर की सहायता से पानी छिड़का जाता है.
  • Within one or two days the grains sprout. Now the germinated grains are spread in the trays uniformly. Then keep the trays on the stands etc. and water is sprayed 8-10 times in a day by the help of sprinkler or hand sprayer.
  • ये ट्रे सामान बेचने वाली ऑनलाइन कमर्शियल वेबसाइट पर आसानी से मिल जाती है. इनकी साइज़ 2*1.5 फीट रहती है. ये 25 या 50 के सेट में मिलती है जिनकी कीमत 2500-11000 तक रहती है.
  • These trays can be purchased from the items selling commercial websites. It comes in set of 25 or 50 trays. The cost of sets vary from Rs. 2500 to 11000 Rs. And the size of these trays may be 2*1.5 feet or 60*40 cm  
  • 7-8 दिन के बाद चारा 6-8 इंच की लम्बाई का हो जाता है. एक ट्रे से 10 किलो चारा मिलता है. जो एक पशु के लिए पर्याप्त है. इस तरह से 5 ट्रे के चारा पांच पशुओ के लिय पर्याप्त है. इस तरह क्रमश ट्रे में चारा उगाकर लगातार हरे चारे का उत्पादन कर सकते है.
  • Within 7-8 days the fodder grows up to a length of 6-8 inches. Now it is ready to graze for animal. Each tray can produce 10 kilograms fodder, which is sufficient for one animal. So fodder of 5 trays can be used for 5 animals per day. So the fodder is grown subsequently to fulfill the daily requirement of animals
  • अगर किसान या डेयरी वाले चाहे तो इसका सेट भी लगवा सकते है, 50 ट्रे वाले सेट की कीमत 18-20 हजार रुपये तक रहती है. इसमें स्टैंड रहता है जिस पर ट्रे को रखते है एवं जिसके ऊपर हरी मेट ढकी रहती है व स्प्रिंकलर लगा रहता है पानी देने के लिए. इस सेट पर छाव भी की जाती है.
  • If farmer needs, he can establish a set of hydroponics which cost is Rs. 18-20 thousands. In this set 50 trays come. These trays are kept up on the stand and it is covered with green met.
  • And sprinklers are set for irrigation to growing fodder. This set is established in permanent shed.  
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पौधशाला – नर्सरी – ( Nursery ) का व्यवसाय

पौधशाला – नर्सरी – Nursery का व्यवसाय

पौधशाला – नर्सरी – ( Nursery ) नमस्कार दोस्तों आप सभी का स्वागत है हमारी इस वेवसाईट किसानहोमकार्ट.कॉम (www.kisanhomecart.com) में आज हम यहाँ समझेंगे नर्सरी के बारे में एवं उससे लाभ या पैसा कैसे कमाए.

नर्सरी कई प्रकार की होती है- फलों के पौधे की नर्सरी (नवोदभिद) – Fruit Plant Seedlings सब्जी की पौध नर्सरी – Vegetable Seelings सजावटी पौधे की नर्सरी – Ornamental Plant Seedlings. औषधीय पौधों की नर्सरी – Medicinal Plant Seedlings. वानिकी पौधों की नर्सरी – Forest Plant Seedlings.

नर्सरी के अन्य प्रकार – अर्ध सरंक्षित पौधशाला (Semi Protected ) – इसमें आधी जगह खुली रहती है व आधी जगह किसी नेट या पक्की दीवार व छत से ढकी रहती है . पूर्ण सरंक्षित पौधशाल  ( Fully Protected ) – यह पूरी तरह से नेट आदि से ढकी रहती है. सभी पौधशाला से सम्बंधित कार्य उसी के अन्दर किये जाते है.

अनुदान/छूट ( Subsidy -Rebate ) – इसमें 0.25 हेक्टर से 4 हेक्टर की नर्सरी रहती है. इसमें 1 हेक्टर तक की नर्सरी को छोटी नर्सरी व 4 हेक्टर तक की नर्सरी को बड़ी नर्सरी कहते है.इसी आधार पर रुपये प्रति हेक्टर के मान से या लागत का 50 %  अनुदान नर्सरी विकसित करने पर दी जाती है.

पौधे तैयार करना – कुछ लोग शुरूआत में बड़ी नर्सरी से पौधे मगाते और उसमें अपना लाभ/मार्जिन जोड़कर फिर पौधों को बेचते है. सजावटी पौधों की नर्सरी जो शहर में रहती है वो इसी तरह का व्यापर करते है. लेकिन अन्य लोग या किसान शुरूआत मे ऐसा कर सकते है.लेकिन पहले किसान आदि को फलों आदि के पेड़ो का बगीचा तैयार करना चाहिए उसके बाद उनसे पौध तैयार करके फिर बेचना चाहिए. सभी तरह के पौधे या तो पेड़ के किसी भाग से या पौधों को आपस में जोड़कर नए पौधे तैयार किय जाते है. जिन किसान भाइयो के पास फलो के बगीचे है वो लोग थोड़ा प्रशिक्षण लेकर आसानी से पौध तैयार कर सकते है. सब्जी की पौध – हर मौसम खरीफ, रवि व जायद में सब्जी के पौधों की मांग लोकल/स्थानीय किसानों की रहती है. तो आसानी से सब्जी की पौध तैयार कर अन्य किसानों को बेच सकते है. वानिकी पौधों की जानकारी के लिए अपने जिले में वन विभाग में संपर्क कर सकते है.

प्रशिक्षण एवं अनुदान ( Training & Subsidy )– जो शासकीय संस्थान है उधानिकी या वानिकी या औषधीय पौधों से सम्बंधित उनसे संपर्क करके, वहा जाकर प्रशिक्षण लिया जा सकता है. इसकी जानकारी ऑनलाइन उनकी वेवसाईट आदि पर आसानी से मिल जाती है. अपने जिले में उधानिकी, कृषि विभाग या आत्मा परियोजना के कार्यालय में भी प्रशिक्षण के लिय संपर्क कर सकते है. अनुदान का लाभ लेने के लिए किसानों को अपने जिले में उधानिकी विभाग में सम्पर्क करना चाहिए.

स्ट्राटेजी – कार्य योजना/ विपणन /मार्केटिंग (Strategy/Planning/Marketing – नर्सरी का व्यवसाय एक टाइम लेने वाला व्यवसाय है, शुरूआत में दिक्कत आती है, लेकिन जब एक बार आप पौधे तैयार करना आदि सीख जाते है तो पौध की लागत बहुत ही कम हो जाती है. नर्सरी के प्रचार प्रसार के लिए रोड के किनारे पौधों की प्रदर्शनी लगा सकते है, सोशल प्लेटफार्म जैसे फेसबुक आदि पर पेज या आई.डी. बनाकर अपने व्यापर का प्रचार प्रसार कर सकते है. सरकारी विभाग विभिन्न योजनाओं के तहत बगीचा आदि लगवाते है वहा भी संपर्क कर सकते है.

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इस तरह किसान भाई खेती के साथ नर्सरी में पौध तैयार करके भी अधिक लाभ कमा सकते है.


खाद बीज दवाई के लायसेंस की फीस

खाद बीज दवाई के लायसेंस की फीस जो भी व्यक्ति खेती बाड़ी, कृषि से जुड़े है एवं जो थोड़े पढे लिखे है उनके लिए खेती में काम आने वाले खाद/ उर्वरक, बीज व दवाई आदि की दुकान खोलकर व्यवसाय करना बहुत ही फायदेमंद है. इसमें कोई भी व्यक्ति जो इस तरह का व्यवसाय करना चाहता है इन सभी का लाइसेन्स बनवाकर व्यवसाय कर सकता है. इसमें खाद, बीज व दवाई का लाइसेंस अलग अलग लेना पड़ता है. एक ही व्यक्ति इन तीनो का लाइसेन्स ले सकता है.खाद/उर्वरक – इसमें रासायनिक या जैविक दोनों तरह के खाद आते है. जैसे डी.ए.पी., यूरिया, एन.पी.के. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश आदि. बीज – विभिन्न फसलों के प्रमाणित बीज, संकर बीज, बी.टी. बीज आदि. सब्जियों का बीज, फूलों का बीज आदि. दवाई – इसमें पेस्टिसाइड आते है, जिसमे कीटनाशी ( कीड़ो को मारने वाली दवाई ), कवकनाशी ( रोगों को ख़त्म करने वाली दवाई ), खरपतवारनाशी ( फसल में उगने वाले खरपतवारो को नष्ट करने वाली दवाई ) आदि.इसमें खाद, दवाई व विभिन्न फसलों के बीजों के लाईसेंस कृषि विभाग से बनेंगे. व उधानिकी फसलों के बीजों ( फल व सब्जी का बीज ) का लाइसेन्स उधानिकी विभाग से बनवाना पड़ेगा.   लाइसेंस की फीस – खाद/उर्वरक का लाईसेन्स – रिटेल शॉप की फीस  (फुटकर/खुदरा दुकान का लाइसेंस ) 1250 रुपये. रिटेलर – जो बड़े दुकानदार से खाद खरीदते है और फिर किसान को बेचते है. होलसेल शॉप की फीस – ( थोक की दुकान का लाईसेन्स ) – 2250 रुपये. होलसेलर – जो सीधे कंपनी से खाद खरीदते है फिर छोटे दुकानदार व किसानों को खाद बेचते है.

पेस्टिसाइड का लाइसेन्स –ग्राम/ग्राम पंचायत में दुकान खोलने के लिए लाईसेन्स की फीस  – 1500 रुपये तहसील/विकासखण्ड/जिला में दुकान खोलने के लिए लाईसेंस की फीस -7500 रूपये. बीज का लाइसेंस –फसलों का बीज/ सब्जी के बीजों के लाइसेंस की फीस – 1000 रुपये.

इस तरह से कोई भी व्यक्ति लाइसेंस बनवाकर गाँव/तहसील/विकासखंड व जिले में खाद बीज दवाई की दुकान आसानी खोल सकता है.

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