कड़कनाथ मुर्गीपालन व्यवसाय

मुर्गीपालन पालन व्यवसाय –

खेती में मुर्गीपालन एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यवसाय है. जिन क्षेत्रों में लोग चिकन खाते है उन क्षेत्रों के लोग इसका व्यवसाय कर सकते है. यह मुर्गा ब्रॉयलार मुर्गे की तुलना में काफी महगा बिकता है. जों इसका खरीदना चाहते है या इसका व्यवसाय करना चाहते है वो लोग इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र झाबुआ मध्यप्रदेश में संपर्क कर सकते है. उनका संपर्क विवरण ऑनलाइन मिल जायेगा. वहा पर संपर्क करके कोई भी चूजे बुक करा सकते है. चूजों के लिए पैसे पहले जमा कराने पड़ते है उसके कुछ दिन बाद उनकों कड़कनाथ मुर्गे के चूजे मिल जाते है. यह एक केन्द्रीय सरकार का संस्थान है.

Green Fodder Production within 10 Days.

Hydroponics – Green Fodder Green Fodder Production within 10 Days हाइड्रोपोनिक्स – हरा चारा 10 दिन में उत्पादन करना. इसमें बिना मिट्टी व खेत के हरा चारे का उत्पादन कर सकते है. इसमें बहुत ही कम जगह, पानी व समय की आवश्यकता होती है. साल के किसी भी महीने में तैयार कर सकते है. डेयरी पशुपालकों को गर्मी में चारे की बहुत आवश्यकता रहती है तो वो लोग इस विधि से आसानी से हरे चारे का उत्पादन कर सकते है.

Production of Green fodder for dairy and other animal with the help of hydroponics method. In this method, soil or field  is not required. It requires very little space, time and water. Fodder can be produced round the year but mostly the problem of fodder comes in summer season (march to June)

  1. इस विधि में हरा चारा उगाने के लिए मक्का, ज्वार या बाजरा का उपयोग किया जाता है. लेकिन अधिकतर  जगह मक्का का ही इस्तेमाल किया जाता है. मक्का आसानी से उपलब्ध हो जाती है क्योकि अधिकतर प्रदेशो में अभी मक्का का उत्पादन किया जाता है. तो अपने नजदीकि के जिले या राज्य में मक्का तलाश सकते है. In this method maize/corn, sorghum and Pearl millet/Bajra can be used. But mostly Maize is used for this because it is easily available in the most of states.
  • अब मक्का के दानों को 24 घंटे तक पानी में रखते है और उनकों पानी सोखने देते है. 24 घंटे बाद पानी से बाहर निकालकर उसको जूट के गीले बोरो पर फैला दिया जाता है, एवं दुसरे जूट का बोरा उसके ऊपर ढक दिया जाता है. बोरो को थोड़ा गीला रखा जाता है.
  • In this method the grain of the maize is soaked in water for 24 hours and after 24 hours the grains are brought out and spread upon the wet jute bag and the grains are covered with other jute bag. The jute bags are kept moist to germinate the grain.
  • एक-दो दिन में मक्के के दाने अंकुरित हो जाते है, इन अंकुरित दानों को प्लास्टिक की ट्रे में समान रूप से फैला दिया जाता है, फिर इन ट्रे को स्टैंड आदि पर रखकर रोज 8-10 बार इन दानों पर स्प्रिंकलर या हैण्ड स्प्रयेर की सहायता से पानी छिड़का जाता है.
  • Within one or two days the grains sprout. Now the germinated grains are spread in the trays uniformly. Then keep the trays on the stands etc. and water is sprayed 8-10 times in a day by the help of sprinkler or hand sprayer.
  • ये ट्रे सामान बेचने वाली ऑनलाइन कमर्शियल वेबसाइट पर आसानी से मिल जाती है. इनकी साइज़ 2*1.5 फीट रहती है. ये 25 या 50 के सेट में मिलती है जिनकी कीमत 2500-11000 तक रहती है.
  • These trays can be purchased from the items selling commercial websites. It comes in set of 25 or 50 trays. The cost of sets vary from Rs. 2500 to 11000 Rs. And the size of these trays may be 2*1.5 feet or 60*40 cm  
  • 7-8 दिन के बाद चारा 6-8 इंच की लम्बाई का हो जाता है. एक ट्रे से 10 किलो चारा मिलता है. जो एक पशु के लिए पर्याप्त है. इस तरह से 5 ट्रे के चारा पांच पशुओ के लिय पर्याप्त है. इस तरह क्रमश ट्रे में चारा उगाकर लगातार हरे चारे का उत्पादन कर सकते है.
  • Within 7-8 days the fodder grows up to a length of 6-8 inches. Now it is ready to graze for animal. Each tray can produce 10 kilograms fodder, which is sufficient for one animal. So fodder of 5 trays can be used for 5 animals per day. So the fodder is grown subsequently to fulfill the daily requirement of animals
  • अगर किसान या डेयरी वाले चाहे तो इसका सेट भी लगवा सकते है, 50 ट्रे वाले सेट की कीमत 18-20 हजार रुपये तक रहती है. इसमें स्टैंड रहता है जिस पर ट्रे को रखते है एवं जिसके ऊपर हरी मेट ढकी रहती है व स्प्रिंकलर लगा रहता है पानी देने के लिए. इस सेट पर छाव भी की जाती है.
  • If farmer needs, he can establish a set of hydroponics which cost is Rs. 18-20 thousands. In this set 50 trays come. These trays are kept up on the stand and it is covered with green met.
  • And sprinklers are set for irrigation to growing fodder. This set is established in permanent shed.  
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दुधारू पशुओ का चारा

बरसीम – पशुओ  के लिए चारा
दुधारू पशुओ का चारा

बरसीम – हरा चारा

  • वानस्पतिक नाम – ट्राइफोलियम अलेक्जेन्डरियम (Trifolium alexandrium)
  • इजिप्टीयन क्लोवर
  • यह पशुओ के लिए बहुत ही अच्छा हरा चारा है. यह सर्दी में अक्टूबर से नवम्बर महीने में बोई जाती है.
  • इसकी बुबाई के लिए पहले खेत को अच्छी तरह तैयार कर लिया जाता है. इसके बाद पूरे खेत में मनचाहे साइज़ की क्यारी बना ली जाती है. इस क्यारी में पानी भरते है इसके बाद छिटकवा विधि ( इसमें पानी से भरी हुई क्यारी में बरसीम के बीज को छिटक कर पूरी क्यारी में फेकते है) से बरसीम की बुवाई करते है. पानी देते जाते है और पानी भरी हुई क्यारी में बीज छिटक कर डालते जाते है.
  • पहली कटाई में चारे की मात्रा कम निकलती है इसलिए सरसों का बीज 2-3 किलोग्राम प्रति हेक्टर, बरसीम के बीज के साथ मिलाकर बोना चाहिए. यह एक दलहनी फसल है, इसलिए इसमें खाद की मात्रा की बहुत कम जरूरत होती है. पहली कटाई एवं दूसरी कटाई के बाद यूरिया 25 किलोग्राम/हेक्टर की दर से डाल सकते है. इसमें खरपतवार के रूप में कासनी उगती है, इसलिए इसका अच्छा बीज उपयोग करना चाहिए.
  • इसकी बीजदर 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टर रहती है.
  • बुवाई के दो महीने बाद चारे के लिए कटाई शुरू हो जाती है. इसके बाद हर 18-20 दिन के बाद कटाई होती है. 8-10 कटाई तक कर सकते है. प्रत्येक 20-22 दिन के बाद सिंचाई करते रहे.
  • बीज उत्पादन – मार्च तक कटाई करके फसल को छोड़ दिया जाता है, इसके बाद फसल में फूल व बीज लगते है व मई या जून तक फसल बीज की कटाई के लिय तैयार हो जाती है.
  • एक हेक्टर में 4-5 क्विंटल तक बीज उत्पादन कर सकते है. इसके बीज का भाव बाजार में 100-175 रुपये प्रति किलोग्राम तक रहता है.
  • 2-3 पशुओ के लिए 1/10 हेक्टर भाग का चारा पर्याप्त है.
  • इसका बीज आपके जिले में कृषि की खाद, बीज दवाई बेचने वालों की दुकान पर मिल जायेगा.
  • आप चाहे तो ऑनलाइन भी सर्च/खोज/तलाश सकते है.

 

पशुओ के रोग एवं उपचार

पशुओ के सामान्य रोग, लक्षण एवं प्राथमिक उपचार –
  • 1. रोग – मुह पकाना व छाले पड़ना
  • कारण – कोई बीमारी, कांटे लगना एवं दांत ख़राब होना.
  • लक्षण – चारा कम खाना व चारा खाना बंद करना, लार टपकना, मुह बा जीभ में छले पड़ना, बदबू आना बा जीभ बाहर आना आदि.
  • प्राथमिक उपचार – लाल पोटाश के 1% घोल से अच्छी तरह से पूरा मुह 2-3 बार धोना व ग्लिसरीन मुह में लगाना.
  • 2. पेट फूलना या अफरा
  • कारण – चारे में परिवर्तन व असंतुलित आहार, बासी खुराक, सूखे चारे के बाद हरा चारा अधिक मात्रा में खिलाना.
  • लक्षण- पशु के बाई तरफ का पेट अधिक फूलना, ढोलक जैसी आवाज आना, पशु का बार-बार उठना बैठना, लार टपकना, मुह से साँस लेना, जीभ बाहर निकालना, पेट दर्द व कराहना.
  • प्राथमिक उपचार- पशु को बैठने नहीं देना व दवाई धीरे-धीरे पिलाना.
  • तारपीन का तेल 30-50 ग्राम पिलाना.
  • मीठा तेल 500 ग्राम पिलाना.
  • हींग 10-15 ग्राम या टिपोल तेल 50 ग्राम पानी के साथ पिलाये.
  • 3.  कब्ज या पेट में गांठ पड़ जाना
  • कारण – ज्यादा सूखा चारा खाना, कम पानी पीना, गला-सडा चारा खाना.
  • लक्षण- पशु सुस्त होना, जुगाली करना बंद करना, बाई तरफ पेट फूलना व सख्त होना, गोबर कम करना या बंद होना, गोबर सख्त व सूखा होना और पेट दर्द होना.
  • प्राथमिक उपचार- 1. मैग्नेशियम सल्फेट 100-250 ग्राम, सादा नमक 100 ग्राम, गुड 250 ग्राम, 1 या 1.5 लीटर गर्म पानी के साथ देना.
  • मैग्नेशियम सल्फेट के साथ 50-100 ग्राम हिमालय बत्तीसा देना.
4. पेट में कीड़े पड़ना
  • कारण- आसपास के वातावरण में कीड़ो के अंडो के माध्यम से गन्दगी और बीमार पशु के गोबर से, अस्वच्छ पानी आदि के द्धारा.
  • लक्षण- पशु सुस्त व शक्तिहीन, गोबर पतला करना, गोबर में काला खून व कीड़े दिखना, पशु में खून की कमी, पशु के चारा खाते हुए भी शरीर की वृद्धि कम व पेट का बढ़ जाना.
  • प्राथमिक उपचार- 1. एन्टीपार – (पाईपराजीन) 5-25 मिली.
  • 2. पानाक्यूर टेबलेट – छोटा पशु 0.5 ग्राम, बड़ा पशु 1.5 ग्राम/100-150 कि.ग्रा.

    5. दस्त/अतिसार
  • कारण – यह रोग कीटाणुओं द्धारा होता है, यह एक सक्रामक रोग है. मुख्य कारण अधिक मात्रा में बछड़े को दूध पिलाने व बछड़े को गंदे व आद्र व बंद कमरे में रखने से होता है, खली न खिलाने आदि.
  • लक्षण- सफ़ेद, पतले दस्त के साथ बदबू, बछड़े का धीरे-धीरे कमजोर होना व रोग प्रचंड रूप में होने पर बछड़े का मर जाना.
  • प्राथमिक उपचार – 5 ग्राम टेबलेट स्ट्रीनासीन टेरामाईसिन या ट्रामेघप्रिम सल्पा देना चाहिए.
  • छाछ या चावल मांड को 25-50 ग्राम नेबलेन पावडर के साथ 3 बार देना चाहिए.
  • 6. मोच, सूजन, लड़खड़ाना, हड्डी का उतर जाना
  •  कारण- जानवर के फिसलने, ऊँची-नीची  जगह चलने, अधिक सामान खीचने से होता है.
  • लक्षण- शरीर के जोड़ो और मांसपेशियो स्नायु व नस में चोट के कारण लंगड़ापन और दर्द होना, सूजन आना, पशु का एक स्थान पर पड़े रहना और उठना नहीं आदि.
  • प्राथमिक उपचार- पहले वर्फ से सिकाई, 2-4 दिन होने पर नमक के गर्म पानी से सिकाई, साथ में लिनिमेह या आयोडेक्स से मालिश करके पशु को चलाना.
  • 7. सींग टूटना
  • कारण- आपस में पशुओ के लड़ने से, लाठी लगने, टक्कर लगने आदि से सींग टूट जाता है.
  • लक्षण- सींग से खून निकलना, सींग टूटना, सींग का खोल उतर जाना.
  • प्राथमिक उपचार- अगर खोल निकलता है व खून बह रहा है तो टिबेनजाइन लगाकर कस के पट्टी बांधे, टूटे सींग पर टिबेनजाइन का फाया रखकर खून बंद करे और पट्टी बांधे.
  • 8. दाद – खुजली
  • कारण- चर्म रोग, छूत से एक पशु से दुसरे को होता है.
  • लक्षण- पशु को खुजली होती है तो शरीर पर छोटे-छोटे गोल आकार के जख्म हो जाते है चमड़ी लाल हो जाती है.
  • प्राथमिक उपचार- लाल पोटाश के घोल से साफ कर गंधक का मलहम लगाये, पशु को अलग रखे.
  • थनों का फटना-
  • कारण – सर्दी के मौसम में अधिक होता है, बछड़े की लार से पशु के थन की चमड़ी का खुश्क होना, चमड़ी का फटना, दांतों से खरोच आना.
  • लक्षण- थन की चमड़ी फट जाती है, खून निकलना, थनों में सूजन व दर्द होना आदि.
  • प्राथमिक उपचार – हल्के गर्म पानी में 1% पोटाश के घोल से साफ कर दूध निकालने के बाद मलहम लगाना चाहिए और चमड़ी न सूखे इसके लिए ग्लिसरीन थनों में लगानी चाहिए.
  • 9. जू –
  • कारण- पशुओ के आपस में संपर्क में आने से, पशुओ के शेड में उपस्थित जू से, चारागाह आदि से.
  • लक्षण- पशुओ के शरीर के निचले भाग में, पूँछ व पैरो के बीच, बालों में जू खुजली करती है.
  • प्राथमिक उपचार – 250 ग्राम नीम की पत्ती व तम्बाकू की पत्ती को दो लीटर पानी में उबालकर 10 लीटर ठन्डे पानी में मिलाकर शरीर को साफ करे.
  • 10. जहरवाद/थनैला-
  • कारण – पूरा दूध थन से न निकलना, गन्दी जगह पर पशुओ जा बैठना, मिलकर द्धारा व बछड़े के दांत आदि से.
  • लक्षण – थन में सूजन, थन का फटना, थथोले पड़ना, खून व पीप निकलना आदि.
  • प्राथमिक उपचार- अधिक सूजन होने पर ठंडी बर्फ से सिकाई, दूध तुरंत खाली कर थनों में मलहम डालकर, पशु चिकित्सक को दिखाए.
  • उपचार करने से पूर्व पशु चिकित्सक से संपर्क जरूर करे.
  • धन्यवाद

Thanks.

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